।। शीतला सिंह।।
(संपादक, जनमोर्चा)
पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सरकार ने विश्व हिंदू परिषद की परंपराओं से हटकर चौरासी कोसी परिक्रमा पर प्रतिबंध लगायी थी. और अब विहिप की 13 अक्टूबर यानी दुर्गा पूजा के मौके पर नित्य पंचकोसी परिक्रमा के घोषित कार्यक्रम पर भी रोक लगा दिया है. केवल साधु-संतों और बिना किसी लाव-लश्कर, झंडा-बैनर, गाजा-बाजा और हथियारों के जो लोग परिक्रमा करना चाहेंगे, उन्हें इससे मुक्त कर दिया है. विहिप ने यह आयोजन अयोध्या में राममंदिर स्थापना आंदोलन को पुन: आरंभ करने की नीयत से किया है.
उसकी घोषणा भी है कि हम तो यहां मंदिर स्थापित करके ही मानेंगे. सरकार का कहना है कि यह प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है और उसने भविष्य के संबंध में अपने निर्णय में जो प्रतिबंध आयद किये हैं, हमें उनका पालन करना है. इस प्रकार यह परिक्रमा वास्तव में अयोध्या विवाद को नये सिरे से खड़ा करने और इस क्षेत्र में सांप्रदायिक उत्तेजना फैलाकर इसका राजनैतिक लाभ उठाने का प्रयत्न है इसलिए इसे धार्मिक आचरण की संज्ञा में नहीं रखा जा सकता.
विहिप यह जानता है कि जब 28 नवंबर, 1990 को अयोध्या मार्च की घोषणा की गयी थी, तब वह और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने मिल कर देशभर में इसकी तैयारी की थी. उसके पहले मुलायम सिंह ने फैजाबाद हवाई अड्डे पर एक ऐतिहासिक सभा की थी. उन्होंने परंपरागत परिक्रमा मेला, जो अक्षय नवमी के दिन होता है, पर प्रतिबंध लगा दिया था. इसे लेकर बहुसंख्यकों में यह संदेश गया था कि यह सरकार तो हमारे पारंपरिक धार्मिक आयोजनों की भी विरोधी बन गयी है. क्या कानून व्यवस्था के नाम पर धार्मिक आयोजनों पर प्रतिबंध लगाना उचित है? इस प्रश्न को लेकर लोग उच्च न्यायालय पहुंचे थे. उसने भी यही निर्देश दिया था कि परंपरागत धार्मिक आयोजन में भाग लेने से किसी को न रोका जाये. तब सुरक्षाबलों से घिरी अयोध्या में तकरीबन 28000 लोग पहुंचे थे. केंद्र सरकार ने रेलों और प्रदेश सरकार द्वारा परिवहन निगम की बसों के संचालन को बंद कर दिया गया था, लेकिन इसका लाभ विहिप से जुड़ी भाजपा को मिला था. 1991 में उसे पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में बहुमत मिला था. इसी सरकार के कारण छह दिसंबर, 1992 को बाबरी मसजिद का विध्वंस किया गया था.
लेकिन परिस्थितियां बदलीं और अब राम मंदिर मुद्दा और भाजपा से लोगों का मोह भंग हो चुका है. इसीलिए उसके बाद हुए सभी चुनावों में किसी में भी भाजपा को अपेक्षित संख्या में सीटें नहीं मिल पायीं. जब भाजपा ने अपनी सरकार की सुविधा के लिए राम मंदिर मुद्दा, धारा-370 की समाप्ति सहित चार मुद्दों को ठंडे बस्ते में डाला, तो लोगों को असलियत समझ में आ गयी कि यह सब धार्मिक परंपरा,भावना की रक्षा, राम मोह या उसके प्रति लगाव नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ से जुड़ा हुआ मामला था. इस असलियत के उजागर होने के बाद अयोध्या में राम मंदिर मुद्दा भी लोगों में उत्साह का कारण नहीं रह गया.
अब प्रश्न नित्य परिक्रमा पर प्रतिबंध का है, क्या इसे संविधान में दी हुई धार्मिक स्वतंत्रता और पूजा-अर्चना की छूट माना जाये या इसके खिलाफ भी प्रतिबंधात्मक कदम उठाये जायें. इस दृष्टि से तो यह प्रतिबंध अनुचित ही लगता है, क्योंकि राज्य सरकार को लोक व्यवस्था बनाये रखने के लिए के लिए कदम उठाने की तो छूट है, लेकिन कोई परिक्रमा कब करें या न करें यह सब उसके दायित्व से परे है. इसलिए वह लोक व्यवस्था बनाये रखने के लिए प्रतिबंध तो लगा सकती है, लेकिन यात्रओं पर नहीं. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि नित्य परिक्रमा की घोषणा विहिप के अधिकार क्षेत्र में नहीं है. निश्चित रूप से चुनाव के पहले इस क्षेत्र में धार्मिक तनाव फैलाना ही इसका उद्देश्य है, जिसके लिए धार्मिक आवरण में इसे प्रस्तुत करके देश भर से अपने समर्थकों को बुलाने का प्रयत्न हो रहा है.
अभी चुनाव की तिथि की घोषणा न होने के कारण आचार संहिता लागू नहीं है, इसलिए यह स्पष्ट है कि लाभ उठानेवाला एक समुदाय कैसे इस क्षेत्र में उत्तेजना पैदा करने के लिए उतावला है. यह तो अच्छा हुआ कि प्रशासन ने आमजन को परिक्रमा की अनुमति दे दी है, केवल ऐसे प्रतिबंधों पर ही अमल करने की घोषणा की है, जो कानून और व्यवस्था की रक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं. अच्छा होता कि इसमें विहिप की घोषणा का कहीं जिक्र ही न होता. जहां तक नित्य परिक्रमा का संबंध है, यदि उसे तारीखों में बांधा जाये, तो निश्चित रूप से असलियत सामने आ ही जायेगी कि परंपरागत आयोजनों से भिन्न इस नियतकालिक कार्यक्रम की आवश्यकता क्यों पड़ी है?
