।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।
अर्थशास्त्री
बड़े राज्यों के पिछड़े इलाकों को दोहरा नुकसान होता है. राज्य सरकारें उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दे पाती हैं. साथ–साथ केंद्र से मिलनेवाली सुविधाओं से भी वे वंचित रह जाते हैं, चूंकि वे बड़े राज्य के हिस्से हैं.
आंध्र प्रदेश के विभाजन को लेकर पार्टियां पसोपेश में हैं. तेलगु देशम पार्टी ने पूर्व में विभाजन का समर्थन किया था, लेकिन अब यह पार्टी विभाजन का विरोध कर रही है. वाइएसआर कांग्रेस ने पहले इस पर स्पष्ट मत नहीं दिया था, परंतु अब यह पार्टी भी विरोध कर रही है.
इन विरोधों के पीछे राज्य का हित नहीं, बल्कि इन पार्टियों के नेताओं का हित है. तेलगु देशम के चंद्रबाबू नायडू एवं वाइएसआर कांग्रेस के रेड्डी बंधु सीमांध्र राज्य से हैं. एकल राज्य में ये संपूर्ण राज्य में काबिज रहते थे. विभाजन के बाद इनका क्षेत्र सिमट जायेगा. जाहिर है, इनका प्रभाव बड़े क्षेत्र में बना रहे, इसलिए इनके द्वारा विभाजन का विरोध किया जा रहा है.
प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से तेलंगाना कमजोर है. सीमांध्र के पास समुद्रतट पर बंदरगाह हैं. सीमांध्र का बड़ा क्षेत्र सिंचित हैं, जबकि तेलंगाना के अंदरूनी क्षेत्र सूखे एवं उजाड़ हैं. सीमांध्र के नेल्लोर क्षेत्र में बिजली उत्पादन के कई प्लांट लगे हैं. संपूर्ण क्षेत्र की दृष्टि से देखा जाये, तो सीमांध्र ज्यादा समृद्घ है. परंतु पिछले पांच दशकों में राज्य का विकास हैदराबाद के आसपास केंद्रित रहा है.
हैदराबाद तेलंगाना क्षेत्र में पड़ता है. चंद्रबाबू ने अपने कार्यकाल में हैदराबाद को जगमग बना दिया. राज्य का आइटी सेक्टर पूर्णतया हैदराबाद में केंद्रित है. वर्तमान में राज्य के राजस्व का आधा से ज्यादा हिस्सा हैदराबाद से आता है. तेलंगाना मूल रूप से पिछड़ा होने के बावजूद हैदराबाद के कारण समृद्घ दिख रहा है.
मेरा मानना है कि सीमांध्र के नेताओं द्वारा विभाजन का विरोध सीमांध्र राज्य के हित में नहीं है. हैदराबाद की समृद्घि मानव निर्मित है, जबकि सीमांध्र की समृद्घि प्राकृतिक संसाधनों और भौगोलिक कारणों से है. हैदराबाद के समकक्ष आइटी सेक्टर आदि का विकास सीमांध्र में शीघ्र ही किया जा सकता है, जबकि सीमांध्र की कृषि एवं बिजली उद्योग को हैदराबाद में स्थापित करना कठिन है. सीमांध्र के समुद्रतट और बंदरगाहों को तेलंगाना में नहीं स्थापित किया जा सकता है.
ऐसे में सीमांध्र को चाहिए कि पंजाब और हरियाणा के विभाजन से सबक लें. विभाजन के समय हरियाणा पिछड़ा राज्य था. एकल राज्य के औद्योगिक शहर लुधियाना एवं जालंधर तथा पर्यटन एवं सांस्कृतिक नगरी अमृतसर सभी पंजाब में चले गये थे, फिर भी हरियाणा आज कई क्षेत्रों में पंजाब से आगे निकल चुका है. दिल्ली के नजदीक गुड़गांव, फरीदाबाद एवं रोहतक में बड़ी संख्या में उद्योग लगे हैं.
उधर, उत्तर प्रदेश के विभाजन के बाद उत्तराखंड में काशीपुर एवं रुद्रपुर औद्योगिक नगरियां बन गयी हैं. इसी प्रकार सीमांध्र के नजदीक के कई जिले चेन्नई एवं बेंगलुरू के नजदीक स्थित हैं. सीमांध्र इनके आधार पर तेलंगाना को मात दे सकता है. मुख्य बात यह है कि वर्तमान में तेलंगाना की समृद्घि मानव निर्मित हैदराबाद के कारण है.
इसे सीमांध्र में दोहराया जा सकता है, परंतु सीमांध्र के प्राकृतिक संसाधनों को तेलंगाना में नहीं दोहराया जा सकता है. अत: सीमांध्र के नागरिकों के लिए विभाजन उत्तम है.
छोटे राज्यों का सबसे बड़ा लाभ क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान है. जैसे पुराने पंजाब की सरकार के लिए गुड़गांव और फरीदाबाद की संभावनाओं पर ध्यान देना कठिन था. उनका ध्यान चंडीगढ़, जालंधर और अमृतसर पर रहता था.
हरियाणा के अलग होने के बाद इन जिलों के विकास पर विशेष ध्यान दिया गया. इसी तरह संयुक्त उत्तर प्रदेश की सरकार के लिए उत्तराखंड की पहाड़ियों पर ध्यान देना कठिन था. उत्तराखंड में कृषि का रूप मैदान की तुलना में भिन्न है. यहां समस्या सड़क की है, न कि चकबंदी की.
यहां सिंचाई ट्यूबवेल से नहीं, बल्कि नदी से होती है. उत्तर प्रदेश के साथ जुड़े रहने पर राज्य के सिंचाई मंत्री का ध्यान ट्यूबवेल पर ज्यादा रहता था. इससे उत्तराखंड में कृषि की संभावनाएं पिछड़ रही थीं, लेकिन अब मंत्री इन पर ध्यान दे रहे हैं.
बड़े राज्यों के पिछड़े इलाकों को दोहरा नुकसान होता है. राज्य सरकारें उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दे पाती हैं. साथ–साथ केंद्र से मिलनेवाली सुविधाओं से भी वे वंचित रह जाते हैं, चूंकि वे बड़े राज्य के हिस्से हैं.
जैसे संयुक्त उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों को स्पेशल पैकेज मिलना संभव नहीं था, क्योंकि स्पेशल पैकेज संपूर्ण राज्य को दिया जाता है. विभाजन के बाद उत्तराखंड राज्य को स्पेशल पैकेज मिला है और राज्य के मैदानी हिस्सों में तमाम उद्योग लगे हैं.
हालांकि छोटे राज्यों के कुछ नुकसान भी हैं. सबसे बड़ी समस्या ‘क्रोनी पूंजीवाद’ की है. छोटे राज्यों के मंत्रियों के लिए बड़ी कंपनियों के सामने दृढ़ता से टिके रह पाना कठिन होता है. छत्तीसगढ़ में खनन के क्षेत्र में बड़ी कंपनियां विद्यमान हैं.
उत्तराखंड में हाइड्रोपावर के क्षेत्र में ऐसा ही है. इन कंपनियों के लिए छोटे राज्य के मंत्रियों और अधिकारियों को ‘मैनेज करना’ आसान होता है. इसलिए इन राज्यों की सरकारों को ये कंपनियां ही चलाती दिखती हैं. जिलाधिकारी महोदय को कंपनी के मुख्याधिकारी के सम्मुख गिड़गिड़ाते देखा जा सकता है. कई बड़ी कंपनियों की वार्षिक बिक्री छोटे राज्यों के बजट से ज्यादा होती है.
जैसे रिक्शेवाले को बस के हार्न का सहज सम्मान करना होता है, वैसे ही छोटे राज्य के मंत्री एवं अधिकारी सहज ही बड़ी कंपनियों के कहे अनुसार कार्य करने लगते हैं. लेकिन समग्र दृष्टि से देखा जाये, तो छोटे राज्य ही उत्तम दिखते हैं, बशर्ते बहुत छोटे न हो जायें. छोटे राज्यों की मुख्य समस्या प्रशासनिक हल्केपन की है.
अत: राज्य इतने छोटे नहीं होने चाहिए कि प्रशासन के लिए उपयुक्त अधिकारी ही उपलब्ध न हो सकें. इस दृष्टि से आंध्र प्रदेश का विभाजन सही ही दिखता है और महाराष्ट्र व उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों के विभाजन की दिशा में भी सरकार को पहल करनी चाहिए.
मूल आर्थिक गतिविधियों की दृष्टि से छोटे या बड़े राज्य में अंतर नहीं होता है. सभी राज्य एक बाजार में जुड़े हैं. एक हिस्से में बने माल को दूसरे हिस्से में जाने की छूट है. एक राज्य के नागरिक को दूसरे राज्य में बसने की छूट है. अत: राज्य विभाजन से माल व श्रम के आवागमन पर प्रभाव नहीं पड़ता है.
झारखंड जैसे अपवाद को छोड़ दें, तो छोटे राज्य सफल भी हैं. इसलिए भी बड़े राज्यों के विभाजन पर सकारात्मक पहल करनी चाहिए, लेकिन गोरखालैंड जैसे अति छोटे राज्य से परहेज करना चाहिए. सीमांध्र के लोगों को विभाजन का समर्थन करते हुए एक नहीं, बल्कि कई हैदराबाद बनाने में जुटना चाहिए.
