हर छोटी-बड़ी घटना पर उबल पड़नेवाली राजधानी पटना में दो दिन पहले दिल दहला देनेवाली घटना हुई, पर ऐसा लगा मानो राजधानी ने इसका नोटिस ही नहीं लिया हो. पटना में एक सात साल के बच्चे ने आत्महत्या कर ली. पहली नजर में घटना पर विश्वास करना ही मुश्किल है कि क्या इतना छोटा बच्चा भी आत्महत्या कर सकता है? जिस तरह बच्चे ने आत्महत्या की वह और भी चिंताजनक है.
बच्चा पहले टीवी की मेज पर चढ़ा, उसके बाद वह अलमीरा पर चढ़ गया और दुपट्टे को गले में फंसा कर छत की कड़ी से झूल गया. घटना के पीछे कोई बड़ी बात भी नहीं थी. बच्च लगातार टीवी देखता था, जिस पर उस दिन पिता ने जोर से डांट लगायी थी. उन्हें यह बिल्कुल भी अंदेशा नहीं था कि इससे वह आत्महत्या कर लेगा. यहां यह बात ध्यान देनेवाली है कि बच्चा डरावने और अपराध पर बने सीरियल खासतौर से देखता था. ऐसे सीरियलों में आत्महत्या के दृश्य भी होते थे. पहली नजर में बच्चे को आत्महत्या करने की नकारात्मक प्रेरणा इन्हीं सीरियलों से मिली.
आत्महत्या को लेकर अब तक कई पक्षों पर चर्चा होती रही है, जिनमें पारिवारिक विवाद, आर्थिक तंगी, परीक्षाओं में फेल होना प्रमुख रहा है. नेशन क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, 2011 में एक लाख 35 हजार से ज्यादा लोगों ने आत्महत्याएं कीं, जिनमें उक्त कारण ही प्रमुख थे. ब्यूरो के आंकड़े में कई विवरण हैं, पर ऐसे बच्चों की आत्महत्या को लेकर अलग से कोई रिकॉर्ड नहीं है और न ही टीवी सीरियलों के दुष्प्रभाव का कोई जिक्र है. हालांकि इस तरह बच्चे द्वारा आत्महत्या किये जाने की घटना अब भी अपवाद ही है, पर यह आम हो जाये, इससे पहले पुलिस, सरकार और गैर सरकारी संगठनों को इस दिशा में अवश्य ही सचेत हो जाना चाहिए.
संयुक्त परिवारों के बिखरने जैसी बातों को लेकर सिर्फ चिंता जताने के बदले आज की वर्तमान सामाजिक स्थितियों में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए हर स्तर पर कदम उठाने होंगे. इनमें टीवी सीरियलों के प्रसारण के समय से लेकर अभिभावकों को बच्चों के प्रति जागरूक करने तक की बातें शामिल होनी चाहिए. बिना देर किये अबोध बच्चों व भावी पीढ़ी को बचाने के लिए समाज के हर पक्ष को आगे आना ही होगा.
