दिसंबर के शुरू में दिल्ली की एक फैक्टरी में भीषण आग लगने से 43 लोगों की दर्दनाक मौत और 50 से अधिक के घायल होने की घटना के सदमे से लोग अभी उबर भी नहीं पाये हैं कि गुरुवार को ऐसा एक और हादसा हो गया. सुकून की बात यह है कि इसमें लोगों को बचा लिया गया है.
दिल्ली समेत देश के कई शहरों में फैक्टरियों और इमारतों में ऐसी घटनाएं बरसों से हो रही हैं. वर्ष 2015 में आग से हुई मौतों में 80 फीसदी सिर्फ 20 शहरों में हुई थीं. दुनिया के 195 देशों के सर्वेक्षण पर आधारित एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 में आग की वजह से मरनेवाले पांच लोगों में एक भारतीय था और मृतकों की तादाद 27 हजार से अधिक थी. देश की वित्तीय राजधानी मुंबई में 2008 से 2018 के बीच आग लगने की 49 हजार घटनाओं में छह सौ से अधिक जानें गयी थीं. पिछले वर्ष वहां 37 सौ अधिक दुर्घटनाएं हुई थीं, जिनमें 43 लोग मारे गये थे.
ऐसे हादसों के पीड़ितों में ज्यादातर बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, बंगाल आदि राज्यों के मजदूर होते हैं, जो रोजी-रोटी की उम्मीद में दूसरे राज्यों के शहरों और औद्योगिक ठिकानों का रुख करते हैं. असंगठित क्षेत्र में या अवैध रूप से चल रही फैक्टरी में पलायित मजदूरों को या तो काम करने की जगह पर ही रहना पड़ता है या फिर वे झुग्गी बस्तियों या संकरी गलियों में बेतरतीब बसे मोहल्लों में रहते हैं. ऐसी जगहें भी इन हादसों का शिकार होती हैं.
अवैध फैक्टरियों या बस्तियों में बहुत जल्दी मदद न पहुंच पाने या दमकल की गाड़ियां घटनास्थल पर न जाने की वजह से मृतकों व घायलों की तादाद बढ़ जाती है. तमाम रिपोर्टों के बावजूद दमकल विभाग में समुचित संख्या में न तो प्रशिक्षित कर्मचारी हैं और न ही पर्याप्त जरूरी साजो-सामान. राजधानी दिल्ली में ही यह कमी 65 फीसदी से अधिक है. सरकारों और संबद्ध विभागों द्वारा हर बड़ी घटना के बाद यह भरोसा दिलाया जाता है कि अवैध कारोबारियों और लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होगी, लेकिन हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं. इसका खामियाजा गरीब मजदूरों और उनके परिवार को भुगतना पड़ रहा है.
तेज शहरीकरण के चलते अंधाधुंध निर्माण कार्य भी हो रहे हैं और शहरों के भीतर और सीमाओं पर कारोबार व कॉलोनियां भी बनती जा रही हैं. ऐसे में भ्रष्टाचार और लापरवाही का फायदा उठाकर अवैध गतिविधियां भी तेजी से बढ़ती जा रही हैं. आग से बचाव का मामला राज्य सरकारों के अधीन होता है, लेकिन इस मद में बजट का बेहद मामूली हिस्सा ही आवंटित करती हैं.
नगरपालिकाएं भी धन की कमी का रोना रोती रहती हैं. इन समस्याओं पर गंभीरता से पहल की जरूरत है. बचाव व सावधानी के उपायों के बारे में जागरूकता का प्रसार भी किया जाना चाहिए. लेकिन सबसे जरूरी प्रशासनिक सक्रियता है, ताकि पेट भरने की बेबसी से खतरे व असुरक्षा में काम करते मजदूरों की जिंदगी तबाह न हो.
