सीडीएस : समन्वय की कमान

सुशांत सरीनसुरक्षा विशेषज्ञdelhi@prabhatkhabar.in भारत सरकार ने देश की तीनों सेनाओं के प्रमुख के रूप में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस का पद बना दिया है. अौर भारत के पहले सीडीएस जनरल बिपिन रावत बन गये हैं. इस बात की जरूरत महसूस की जा रही थी कि हमारी तीनों सेनाओं के बेहतरीन प्रबंधन के लिए […]

सुशांत सरीन
सुरक्षा विशेषज्ञ
delhi@prabhatkhabar.in

भारत सरकार ने देश की तीनों सेनाओं के प्रमुख के रूप में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस का पद बना दिया है. अौर भारत के पहले सीडीएस जनरल बिपिन रावत बन गये हैं. इस बात की जरूरत महसूस की जा रही थी कि हमारी तीनों सेनाओं के बेहतरीन प्रबंधन के लिए एक मुखिया हो, जो तीनों के बीच तालमेल बनाये.
कारगिल जंग के बाद जंग के दौरान हुई तमाम कारगुजारियों को देखने-समझने के लिए एक कमेटी का गठन किया गया था. उस कमेटी की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारत सरकार में एक सीडीएस होना चाहिए. जाहिर है, बरसों के बाद हमें सीडीएस मिला है और यह देश की रक्षा-सुरक्षा की दृष्टि से एक बेहतरीन कदम है.
जैसे-जैसे आधुनिकता बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे यह महसूस हो रहा है कि सारी फौजों को एक साथ मिलकर ही लड़ाई लड़नी चाहिए. ऐसा नहीं हो सकता कि थल सेना ने अपनी लड़ाई लड़ ली, लेकिन बाकी सेनाएं चुपचाप हैं. कहने का अर्थ है कि कोई भी लड़ाई हो, तीनों सेनाएं एक साथ अपनी-अपनी भूमिका का निर्वाह करें, जिसके लिए एक मुखिया आदेश दे.
यह मुखिया सीडीएस ही हो सकता है, जो तीनों सेनाओं के बीच समन्वय और तालमेल बनाये और सैन्य ऑपरेशन को अंजाम दें. कोई भी ऑपरेशन तभी मजबूत अटैकिंग वाला हो सकता है, जब तीनाें सेनाएं मिलजुल कर काम करें. तीनों के बीच कोऑर्डिनेशन, कमांड और कंट्राेल, ये तीन ऐसे शब्द हैं, जिसके लिए एक सीडीएस का होना जरूरी है.
हालांकि, शुरू में एक संस्था बनायी भी गयी थी, जिसके तहत तीनों सेनाओं के शीर्ष अधिकारी शामिल थे. और माना यह गया था कि आगे चलकर यही सीडीएस का रूप ले लेगा. लेकिन, वह संस्था चूंकि आगे नहीं बढ़ पायी, इसलिए सीडीएस का मामला थम गया. हालांकि, उसके बाद भी यह बात महसूस की जा रही थी कि देश में एक सीडीएस का होना बहुत जरूरी है.
भारतीय वायुसेना का कमांडर सेंटर अलग-अलग जगहों पर है. कई बार यह देखने को मिला कि इन सेंटरों के बीच में कोई तालमेल बैठ नहीं बन पाता था. साथ ही, जो साजो-सामान सेना खरीद रही थी, वही साजो-सामान वायुसेना भी खरीद रही थी.
इनके बीच संवाद स्थापित करने की भी अपनी अलग मुश्किलें थीं, क्योंकि सबके कार्यक्षेत्र और शक्तियां अलग-अलग होती हैं. यह भी लगता था कि किसी की शक्तियां सीमित न हो जायें, क्योंकि ब्यूरोक्रेसी में चलनेवाली रस्साकशी का शिकार होना आम बात है. इन सब समस्याओं को देखते हुए भारत सरकार का सीडीएस बनाने का निर्णय बहुत ही सराहनीय है.
जनरल रावत के रूप में भारत को उसका पहला सीडीएस मिल गया है. लेकिन, कमांड को लेकर अभी तक बहुत कुछ पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो पाया है. तीनों सेनाओं- थलसेना, जलसेना और वायुसेना- के जो विभाग हैं, उनका कमांड तो अब भी पुराना वाला ही है, बस इनके ऊपर सीडीएस रावत होंगे, जो तीनों के बीच कोऑर्डिनेशन करेंगे.
अब सवाल यह है कि बिना कमांड के वह कितना कोऑर्डिनेशन कर पायेंगे, यह अभी देखनेवाली बात होगी. क्योंकि कुछ चीजें तीनों सेवाओं से भी ऊपर हैं, जैसे बेस कमांड, एयरोस्पेस कमांड और अंडमान निकोबार में सर्विस कमांड आदि. इन सबसे सीडीएस को ऊपर तो रखा गया है, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि इसको परिभाषित कैसे किया जाये.
सरकार के नोटिफिकेशन में यही दिख रहा है कि रक्षा मंत्रालय में एक नया विभाग बना दिया गया है और डिफेंस सेक्रेटरी को वहां रख दिया गया है कि वही आधिकारिक व्यक्ति होगा. यहां एक बात गौरतलब है कि रक्षा मंत्रालय में नियुक्त हुए अधिकारियों में अक्सर बहुत से अधिकारी रक्षा-सुरक्षा की जानकारियों से अनभिज्ञ होते हैं.
न उनको यह पता होता है कि सेनाओं की जरूरतें क्या हैं, न यह मालूम होता है कि सैन्य मामलों को कैसे देखा जाना चाहिए. हम अक्सर देखते हैं कि जो आज कृषि मंत्रालय में कोई पद संभाल रहा है या फिर संचार विभाग में नियुक्त हुआ है, उसे ही उठाकर रक्षा सचिव बना दिया जाता है. ऐसे में उसे किसी भी विभाग की विशेषज्ञता हासिल हो पाना मुश्किल है.
बरसों से चली आ रही यह चीज हमारे सिस्टम की खामी है, जिसे दुरुस्त किये जाने की जरूरत है. बहरहाल, रक्षा मंत्रालय में बने नये विभाग के भी सीडीएस ही अध्यक्ष होंगे, लेकिन वहां इनका आदेश किस तरह से काम करेगा, यह बात भी अभी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है.
एक बेहद महत्वपूर्ण बात यह दिख रही है कि सरकार के सारे सैन्य मामलों में एक आधिकारिक व्यक्ति सलाहकार के रूप में होगा. यह तो अच्छी बात है. लेकिन, अगर सीडीएस के नीचे तीनों सेनाओं के अध्यक्ष नहीं आते, तो फिर सीडीएस का काम कितना प्रभावी होगा, यह भी स्पष्ट नहीं है.
दरअसल, सीडीएस का उद्देश्य यह था कि तीनों सेनाओं के बीच अगर समन्वय बनाना है, तो तीनों विभागों के कमांडों से ऊपर एक अलग थियेटर कमांड बनाना होगा, जिसमें सीडीएस की शक्ति होगी.
इस तरह की पहल अमेरिका और चीन पहले ही कर चुके हैं कि एक युद्ध क्षेत्र में उसका अपना एक कमांड काम करेगा. और आदेश के मामले में वह कमांड समन्वय के साथ तीनों सेनाओं की अध्यक्षता करेगा. तो क्या हम ऐसे थियेटर कमांड की तरफ जायेंगे, यह अभी पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता है.
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि तीनों सेनाओं के बीच समन्वय और तालमेल का काम बहुत आसान नहीं है. क्योंकि, कुछ चीजों में तीनों विभागों के कुछ कार्यक्षेत्र को सीमित करना पड़ सकता है.
इसमें अभी बहुत समय लगेगा, क्योंकि यह इतना जल्दी नहीं हो सकता है कि एक व्यक्ति को शीर्ष पद दे दिया गया, तो कल से सारा समन्वय बनना शुरू हो जायेगा. इसकी प्रक्रिया बहुत लंबी होगी. चीन को अपना ऐसा सिस्टम लाये तीन-चार साल हो गये, लेकिन अभी तक वह अपनी सेनाओं में समन्वय स्थापित करने में पूरी तरह से सक्षम नहीं हो पाया है.
इसलिए अभी हमें देखना होगा कि सीडीएस का कमांड और कंट्रोल की रूपरेखा क्या होगी और अधिकार के ऐतबार से उसका काम क्या होगा. लेकिन, इतना जरूर है कि अगर सभी प्रक्रियाओं को सही से पूरा किया गया, तो भारतीय सुरक्षा के लिए यह महत्वपूर्ण होगा.
(वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)

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