चीन की चुनौती

नवनियुक्त थल सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे ने चीन की सीमा पर समुचित ध्यान देने की आवश्यकता पर बल दिया है. पाकिस्तान से लगी सीमा और नियंत्रण रेखा पर आतंकियों की घुसपैठ तथा युद्धविराम के उल्लंघन की लगातार घटनाओं के कारण स्वाभाविक रूप से सेना चौकस व मुस्तैद रहती है. परंतु चीन की आक्रामता भी बढ़ती […]

नवनियुक्त थल सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे ने चीन की सीमा पर समुचित ध्यान देने की आवश्यकता पर बल दिया है. पाकिस्तान से लगी सीमा और नियंत्रण रेखा पर आतंकियों की घुसपैठ तथा युद्धविराम के उल्लंघन की लगातार घटनाओं के कारण स्वाभाविक रूप से सेना चौकस व मुस्तैद रहती है. परंतु चीन की आक्रामता भी बढ़ती जा रही है. जनरल नरवणे ने सही ही उसे क्षेत्रीय धौंस दिखानेवाला देश कहा है.

वे पश्चिमी कमान के प्रमुख रह चुके हैं. चीन से लगी लगभग चार हजार किलोमीटर लंबी सीमा की रखवाली का जिम्मा इसी कमान का है. कुछ सालों में लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में चीनी सैनिकों के घुसने की अनेक घटनाएं हो चुकी हैं. वर्ष 2017 में सिक्किम के निकट दोक्लाम में दोनों देशों के सैनिक 10 माह तक आमने-सामने रहे थे. भारत दोक्लाम को भूटान का अंग मानता है, जबकि चीन इसे अपने चुंबी घाटी के हिस्से के रूप में देखता है.
यदि वह दोक्लाम पर काबिज हो जाता है और सड़क मार्ग से उसे जोड़ देता है, तो सिलिगुड़ी गलियारे पर वह सीधे नजर रखने में कामयाब हो जायेगा. यह संकीर्ण गलियारा पूर्वोत्तर को शेष भारत से जोड़ता है. चीन की आक्रामकता इस तथ्य से साबित होती है कि वह दोक्लाम की तरह पूर्वी चीनी समुद्र में अपने वर्चस्व का विस्तार करना चाहता है.
आम तौर पर दक्षिण चीनी समुद्र की चर्चा अधिक होती है, पर चीन समेत जापान, ताइवान और कोरिया से लगते इस झीलनुमा क्षेत्र में दखल जमा कर वह प्रशांत महासागर तक सीधी पहुंच को सुनिश्चित करना चाहता है. भले ही अमेरिका या उसके क्षेत्रीय सहयोगियों तथा चीन के बीच युद्ध की गुंजाइश नहीं है, लेकिन चीन अपनी तैयारी में लगा हुआ है. दक्षिण चीन समुद्री क्षेत्र में अमेरिका ने भी सैन्य ठिकानों की संख्या बढ़ायी है.
दोनों देशों के बीच अक्सर तनावपूर्ण बयानबाजी भी होती रहती है. इस तनाव का एक पहलू व्यापार युद्ध भी है. बीते वर्षों में चीन ने एशिया में तेजी से अपने आर्थिक व कूटनीतिक प्रभाव में बढ़ोतरी की है. भारत के अनेक पड़ोसी देश इस प्रभाव के दायरे में हैं. ऐसे में भारत को निश्चित ही अपनी सीमाओं की सुरक्षा मजबूत करने पर ध्यान देने की जरूरत है.
संतोष की बात है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की औपचारिक और अनौपचारिक बैठकों का सिलसिला लगातार जारी है. इन बैठकों के फलस्वरूप सीमा पर तनाव घटाने तथा व्यापार व सहयोग बढ़ाने की दिशा में दोनों तरफ से अनेक साझा पहलें हुई हैं. इन पहलों का अब तक का प्रदर्शन भी उत्साहवर्द्धक है.
इन प्रयासों से कई दशकों से चल रहे सीमा से जुड़े विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की आशा सेनाध्यक्ष ने भी जतायी है. लेकिन एक ओर जहां राजनीति और कूटनीति के माध्यम से परस्पर संबंधों की बेहतरी पर जोर दिया जाना चाहिए, वहीं सैन्य बंदोबस्त और सामरिक नीतियों को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि दोक्लाम की तरह चीनी धौंस का भी मुकाबला हो सके.

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