मजबूत हो साइबर सुरक्षा

संतोषजनक है कि पिछले महीने कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर हुआ साइबर हमला अहम इंफ्रास्ट्रक्चर तंत्र को नुकसान पहुंचाने में नाकाम रहा है. संयंत्र के सामान्य प्रशासनिक कंप्यूटर नेटवर्क और उत्पादन से जुड़े नेटवर्क के बीच संपर्क नहीं रहने के कारण ऐसा संभव हो सका है, परंतु यह घटना ऐसे संयंत्रों की सुरक्षा को मजबूत […]

संतोषजनक है कि पिछले महीने कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर हुआ साइबर हमला अहम इंफ्रास्ट्रक्चर तंत्र को नुकसान पहुंचाने में नाकाम रहा है. संयंत्र के सामान्य प्रशासनिक कंप्यूटर नेटवर्क और उत्पादन से जुड़े नेटवर्क के बीच संपर्क नहीं रहने के कारण ऐसा संभव हो सका है, परंतु यह घटना ऐसे संयंत्रों की सुरक्षा को मजबूत करने की जरूरत को रेखांकित करती है.
हाल के वर्षों में इसी तरह के अनेक हमले अन्य परमाणु ठिकानों पर हो चुके हैं. साल 2016 में हैकरों ने यूक्रेन की बिजली वितरण व्यवस्था को ठप कर दिया था और 2010 में ईरान के परमाणु सेंट्रीफ्यूजों को निशाना बनाया गया था. साल 2013 में दक्षिण कोरिया में भी वायरस के जरिये सेंधमारी की गयी थी.
हालांकि ऐसे साइबर हमलों में हमलावर देश या समूह की पहचान निश्चित कर पाना बहुत मुश्किल होता है, पर रिपोर्टों के अनुसार, कुडनकुलम संयंत्र को निशाना बनानेवाले वायरस का स्रोत उत्तर कोरिया हो सकता है. इस तरह की गतिविधियों पर नजर रखनेवाले अध्ययन समूहों ने सितंबर में ही आगाह कर दिया था कि एक खास किस्म के वायरस का निशाना भारत के बैंक और शोध संस्थान हो सकते हैं.
कुडनकुलम हमले की शुरुआती सूचना भी सोशल मीडिया पर हुए एक पोस्ट से जगजाहिर हुई थी. परमाणु संयंत्रों और वैज्ञानिक अनुसंधान के महत्वपूर्ण केंद्रों पर मुख्य कंप्यूटर प्रणाली को इंटरनेट से अलग रखा जाता है तथा उनकी डिजिटल सुरक्षा को पुख्ता बनाने के लिए विशेष फायरवाल लगाये जाते हैं.
लेकिन जिस तरह से तकनीक की तेज बढ़त हो रही है, इंतजामों पर ही लगातार ध्यान देने की जरूरत है. शोध से ऐसे भी नतीजे निकले हैं, जिनसे पता चलता है कि सुरक्षा बाड़ को कंप्यूटरों के स्पीकरों की फ्रिक्वेंसी के जरिये भी तोड़ा जा सकता है. ये ऐसी फ्रिक्वेंसी होती हैं, जिन्हें कान से सुन पाना भी संभव नहीं होता. आधुनिक युग में युद्धों और हमलों के पारंपरिक रूपों में निरंतर परिवर्तन हो रहा है और डिजिटल क्षेत्र भी एक बड़ा मोर्चा बन गया है.
कुछ अरसे पहले आयी सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि 2016 और 2018 के बीच साइबर हमलों की सूची में भारत दूसरे पायदान पर रहा था. पिछले साल हुए हमलों में 53 फीसदी ऐसे थे, जिनमें पांच लाख डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ था. औद्योगिक व वित्तीय संस्थाओं तथा सरकारी विभागों से ऐसे हमलों के जरिये सूचना चुराने का खतरा भी बढ़ता जा रहा है. एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 में हर मिनट औसतन 1,853 साइबर हमले भारत में हुए थे.
यदि ऐसे हमले अपने नापाक इरादों में कामयाब हो जायें, तो कूडनकुलम संयंत्र को तबाह कर समूचे दक्षिण भारत में फुकुशिमा जैसी भयावह बरबादी ला सकते हैं. किसी रासायनिक उद्योग को निशाना बनाकर भोपाल जैसी त्रासदी घटित कर सकते हैं. इन चुनौतियों से निपटने के लिए यथाशीघ्र व्यापक साइबर सुरक्षा नियमन तथा नियमित व्यवस्था समीक्षा का निर्धारण अति आवश्यक है.

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