स्वास्थ्य पर ध्यान

भारत उन देशों की श्रेणी में है, जो स्वास्थ्य के मद में अपने सकल घरेलू उत्पादन के अनुपात में सबसे कम खर्च करते हैं. इस वजह से नागरिकों को समुचित चिकित्सा और देख-भाल नहीं मिल पाती है. इस स्थिति में सुधार के लिए पिछले कुछ वर्षों से सरकार द्वारा अनेक महत्वाकांक्षी पहलें की गयी हैं, […]

भारत उन देशों की श्रेणी में है, जो स्वास्थ्य के मद में अपने सकल घरेलू उत्पादन के अनुपात में सबसे कम खर्च करते हैं. इस वजह से नागरिकों को समुचित चिकित्सा और देख-भाल नहीं मिल पाती है.
इस स्थिति में सुधार के लिए पिछले कुछ वर्षों से सरकार द्वारा अनेक महत्वाकांक्षी पहलें की गयी हैं, जिनमें राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के दायरे को विस्तार देना और आयुष्मान भारत योजना लागू करना प्रमुख हैं. इसके अलावा आगामी कुछ वर्षों में स्वास्थ्य पर कुल घरेलू उत्पादन का ढाई फीसदी खर्च करने का लक्ष्य भी रखा है. नेशनल हेल्थ प्रोफाइल के अनुसार, यह खर्च अभी 1.28 फीसदी है. संसाधनों और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के साथ इन कार्यक्रमों की सफलता में एक बड़ी अड़चन चिकित्सकों का अभाव भी है. ग्रामीण व दूर-दराज के क्षेत्रों में यह समस्या बेहद गंभीर है.
इसके अलावा उपचार का महंगा होना भी चिंताजनक है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आकलन के अनुसार, अगले सात वर्षों में चिकित्सकों की संख्या विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के स्तर तक लायी जा सकती है. इस मानक के मुताबिक एक हजार लोगों के लिए एक चिकित्सक की उपलब्धता होनी चाहिए.
इस हिसाब से अभी 13.5 लाख डॉक्टर होने चाहिए, लेकिन मौजूदा संख्या लगभग 9.3 लाख है. देश में अभी मेडिकल शिक्षा की 80 हजार सीटें हैं. माना जाता है कि हर साल करीब 23 हजार डॉक्टर अपने पेशे को छोड़ देते हैं. ऐसे में अगर 57 हजार नये डॉक्टर भी उपलब्ध होते हैं, तो सात सालों में चार लाख चिकित्सकों की मौजूदा कमी दूर की जा सकती है. कुछ समय पहले सरकार ने संसद को बताया था कि औसतन 1,457 लोगों के लिए एक डॉक्टर है, लेकिन यह औसत सभी तरह के डॉक्टरों का हिसाब है.
नेशनल हेल्थ प्रोफाइल की रिपोर्ट के अनुसार, करीब 11 हजार लोगों के लिए एक सरकारी एलोपैथिक डॉक्टर है. इससे इंगित होता है कि सरकारी चिकित्सा केंद्रों और अस्पतालों की संख्या भी बढ़ाने की जरूरत है. देश में 675 लोगों के लिए एक सहायक कर्मी है,जबकि हजार लोगों के लिए तीन कर्मियों का अनुपात होना चाहिए. कुछ माह पहले प्रकाशित अमेरिकी संस्था सेंटर फॉर डिजीज डाइनामिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी की रिपोर्ट में तो डॉक्टरों की कमी छह लाख और सहायक कर्मियों की कमी 20 लाख तक आंकी गयी थी. जरूरत जो भी है, पर जिला स्तर पर मेडिकल कॉलेज खोलने की योजना तथा केंद्र व राज्य सरकारों के विभिन्न कार्यक्रमों से इस स्थिति की बेहतरी की उम्मीद भी है. एक पहलू यह भी है कि बड़े शहरों में अस्पतालों व चिकित्सकों की बहुतायत से युवा डॉक्टर छोटे शहरों-कस्बों का रुख करें.
आयुष्मान भारत योजना के तहत 50 करोड़ लोगों को बीमित करने का लक्ष्य है. अन्य निजी बीमा योजनाओं का भी दायरा बढ़ रहा है. संचार व तकनीक की बढ़त से भी स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार में मदद मिल रही है. इन प्रयासों में प्रशिक्षण और सेवा की गुणवत्ता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए.

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