इकबाल की नज्म ''बच्चे की दुआ''

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार ravibhushan1408@gmail.com स्कूल की प्रार्थनाओं में से किन भाषाओं की कितनी प्रार्थनाओं में यह कहा गया है- ‘हो मेरा काम गरीबों की हिमायत करना’? शायर इकबाल (9 नवंबर, 1877- 21 अप्रैल, 1938) ने 1902 में बच्चों के लिए एक नज्म लिखी थी, जिसे ‘बच्चे की दुआ’ भी कहा जाता है. भारत और पाकिस्तान […]

रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
ravibhushan1408@gmail.com
स्कूल की प्रार्थनाओं में से किन भाषाओं की कितनी प्रार्थनाओं में यह कहा गया है- ‘हो मेरा काम गरीबों की हिमायत करना’? शायर इकबाल (9 नवंबर, 1877- 21 अप्रैल, 1938) ने 1902 में बच्चों के लिए एक नज्म लिखी थी, जिसे ‘बच्चे की दुआ’ भी कहा जाता है. भारत और पाकिस्तान की कई पाठशालाओं में बच्चे सुबह की असेंबली में यह प्रार्थना गाते हैं.
पहले यह पार्थना पढ़ें- ‘लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी/ जिंदगी शमअ की सूरत हो खुदाया मेरी/ दूर दुनिया का मेरे दम अंधेरा हो जाये/ हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये/ हो मेरे दम से यूं ही मेरे वतन की जीनत/ जिस तरह फूल से होती है चमन की जीनत/ जिंदगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब/ इल्म की शमअ से हो मुझको मोहब्बत या रब/ हो मेरा काम गरीबों की हिमायत करना/ दर्द-मंदों से जइफों से मोहब्बत करना/ मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको/ नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको…’ यह पूरी नज्म इसलिए लिखी गयी कि हम इसे पढ़कर यह तलाशें कि इसमें बुराई क्या है, जिसमें अल्लाह से यह प्रार्थना की गयी है कि वह हमें बुराई से बचाये.
क्या इस नज्म से किसी को इसलिए शिकायत हो सकती है कि इसमें उर्दू के कई शब्द हैं? जो भाषा के बारे में, हिंदी और उर्दू के बारे में कुछ भी नहीं जानते, वे ही यह कहेंगे कि हिंदी हिंदुओं की और उर्दू मुसलमानों की भाषा है.
यह एक वह खतरनाक खेल है, जिसे अंग्रेजों ने यहां खेला था और हममें से कइयों को खेलने के लिए उत्साहित भी किया, जिसका नतीजा देश का विभाजन था. पीलीभीत जिला के एक सरकारी स्कूल में सुबह की प्रार्थना में गायी जानेवाली इस नज्म को लेकर जिन धार्मिक संगठनों ने आपत्तियां खड़ी की थीं, उनके लिए धर्म, शिक्षा, प्रार्थना, भाषा सबका अपना एक निर्धारित मनचाहा अर्थ है. केंद्रीय विद्यालयों में दो प्रार्थनाएं पढ़ी जाती हैं- ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय’ और ‘दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना’.
खुदा और परमात्मा में क्या कोई अंतर है? यहां संस्कृत में होनेवाली प्रार्थना में अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की बात कही गयी है. इकबाल की नज्म हम सबको गुनगुनानी चाहिए. प्रार्थना को धर्म विशेष से जोड़कर देखना गलत है, क्योंकि कोई भी प्रार्थना मानवजाति के लिए होती है न कि मात्र धर्म विशेष जुड़े उनके अनुयायियों के लिए.
शायर किसी मजहब का नहीं होता. बड़ा शायर हमेशा पूरी मानवजाति के लिए होता है. इकबाल को सुनें- ‘आर्ट की गरज महज हुस्न का एहसास पैदा करना नहीं.
आर्ट जिंदगी के मातहत है. जो लोग जिंदगी के खिलाफ हों, इंसान की हिम्मतों को पस्त और उनके जज्बाते-आलिया (उच्च भावनाओं) को मुर्दा करनेवाले हों, वे काबिले-नफरत हैं.’ गरीबों की हिमायत की बात सब नहीं करते. रानजीति तो हर्गिज नहीं करती.
वह फुसलाती रहती है, जो कहती है वह करती नहीं और जो करती है वह कहती नहीं. राजनीति में क्या सब इसलिए प्रवेश करते हैं कि उन्हें मानव-दुर्दशा नहीं देखी जाती?
इकबाल ने अपने बेटे को लिखा था- ‘मेरा तरीक अमीरी नहीं फकीरी है, खुदी न बेच गरीबी में नाम पैदा कर.’ इकबाल गरीबों की हिमायत करनेवाले शायर हैं.
उनकी शायरी में कई बार गरीबों की बात आयी है- ‘उठो मेरी दुनिया के गरीबों को जगा दो.’ गरीबों के जगने पर ही उनकी गरीबी मिटेगी और दुनिया अधिक खूबसूरत होगी. उनकी शायरी को मजहब से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. प्रोफेसर अब्दुस्सत्तार दलवी (इकबाल विशेषज्ञ, बंबई विवि के पूर्व अध्यक्ष) के अनुसार 1904 से 1908 के बीच की उनकी शायरी को ‘देशभक्तिपूर्व’ और ‘राष्ट्रवादी’ कहा जाना चाहिए.
इकबाल ने ‘तराना-ए-हिंद’, ‘नया शिवाला’ और ‘राम’ के अतिरिक्त गायत्री मंत्र का अनुवाद (आफताब) भी किया. ‘तराना-ए-हिंद’ कविता अब्दुल हमीद शरर के साप्ताहिक पत्र ‘इत्तेहाद’ के 16 अगस्त, 1904 अंक में प्रकाशित हुई थी. दयानारायण निगम ने ‘जमाना’ के सितंबर 1904 के अंक में इसे छापा था.
इकबाल ने इस कविता में हिंदुस्तान को ‘सारे जहां से अच्छा’ कहा था और लिखा था- ‘यूनान-ओ-मिस्र-ओ- रोमा, सब मिट गये जहां से/ अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशां हमारा’. क्योंकि ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’, हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि इकबाल ने जिसे ‘कुछ बात’ कहा है, वह सबसे बड़ी बात है- विविधता में एकता. दुर्भाग्य की बात यह है कि हमने बच्चों की प्रार्थना से भी कुछ नहीं सीखा. बच्चे गरीबों की हिमायत करने की प्रार्थना कर रहे हैं और हम सब जो सयाने और अधिक शिक्षित हैं, गरीबों की हिमायत नहीं करते.
सन 1905 की नज्म ‘नया शिवाला’ में इकबाल ‘नक्श-ए-दुई’ मिटाने और देश मेंन या शिवाला बनाने की बात करते हैं. वे प्रेम पर बल दे रहे थे- ‘धरती के वासियों की मुक्ति पिरीत में है.’ इकबाल ने रामतीर्थ, गुरुनानक और राम पर कविताएं लिखीं. वे अल्लामा (विद्वान) थे और ‘शायर-ए-मशरिक’ (पूरब का शायर) थे.
‘टू नेशन थ्योरी’ की बात करने के बाद भी कभी उन्होंने हिंदुओं से बैर की बात नहीं की. देश धर्म से ऊपर है. आपसी एकता की बदौलत ही देश प्रगति करता है, कायम रहता है. उन्होंने लिखा था- ‘न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदुस्तांंवालों/ तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में.’

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