हरा का हरापन

मिथिलेश कु. राय युवा कवि mithileshray82@gmail.com कक्का कह रहे थे कि वैसे तो भादो कादो (कीचड़) का महीना होता है. लेकिन इसकी धूप भी खूब प्रसिद्ध है. वे बता रहे थे कि भादो की धूप सौतन की बोल की तरह लगती है, तीखी मिर्ची की तरह! जब आसमान साफ होता है और काले-काले बादल के […]

मिथिलेश कु. राय
युवा कवि
mithileshray82@gmail.com
कक्का कह रहे थे कि वैसे तो भादो कादो (कीचड़) का महीना होता है. लेकिन इसकी धूप भी खूब प्रसिद्ध है. वे बता रहे थे कि भादो की धूप सौतन की बोल की तरह लगती है, तीखी मिर्ची की तरह! जब आसमान साफ होता है और काले-काले बादल के टुकड़े को हवा कहीं और उड़ाकर पहुंचा देती है, तब सूरज का रूप देखते ही बनता है.
कक्का की मानें, तो उस धूप के सामने मई-जून की धूप भी बौनी मानी जाती है. कक्का ने यह बताया कि यह धूप स्थायी नहीं होती. अभी प्रचंड धूप है, पर यह जरूरी नहीं कि उसकी प्रचंडता दिन भर थिर ही रहेगी.
जब तक हवा और बादल के टुकड़ों का ध्यान उस पर नहीं जाता है, तभी तक वह मनमानी करती है. हवा जैसे ही लौटती है, बादल के टुकड़े जाने कहां-कहां से यहां-वहां जमा होने लगते हैं. धूप बादलों का जमावड़ा देखते ही दुम दबाकर भाग जाती है और हमारे सामने रिमझिम वाला सुहाना मौसम उपस्थित हो जाता है!
असल में लगातार तीखी धूप के बाद घंटा भर मूसलाधार बारिश हुई, तो लोगों ने त्राहिमाम करना छोड़ गीत गुनगुनाना शुरू कर दिया था. तीखी धूप ने धान की फसल पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था और उसकी पत्तियां पीले रंग में रंगने लगी थीं.
शाम को जब कक्का खेतों की ओर से लौट रहे थे, उनके होंठो पर मुस्कान खेल रही थी. मैं थान के पास सौ बरस के पीपल के पेड़ को निहार रहा था. वे वहां ठहर गये और कहने लगे कि हरा अपना हरापन लौटा लाने में बिलकुल भी समय नहीं लगाता है. सवेरे बारिश हुई और अब उसने अपने ऊपर फैल रहे पीलेपन पर काबू पा लिया है. कक्का की यह बात गजब की थी.
हम दूब पर बैठ गये. मैंने कक्का को बताया कि पीपल भी बारिश के बाद खिला-खिला लग रहा है, जैसे मुस्कुरा रहा हो! कक्का पेड़ को निहारने लगे.
कहने लगे कि यही तो हममें और पेड़-पौधों में अंतर है. हम बहुत पाकर भी संतुष्ट नहीं होते और ये थोड़ा पाकर भी ऐसे खिल उठते हैं कि लगता है पूरी दुनिया की खुशियां इन्हीं की झोली में आ गिरी हों! उन्होंने कहा कि देखो तो, सप्ताह भर की प्रचंड धूप के बाद धान के पौधों को घंटे भर की बारिश नसीब हुई है, लेकिन वे मुग्ध हैं. यह बताते हुए कक्का खिल रहे थे. उनके चेहरे पर फसल की हरियाली का अक्स था.
जब कोई किसान अपने खेतों की ओर से लौटता है, तो वह अपने चेहरे और अपनी आंखों में खेत में लगी फसलों का हालचाल रखकर लौटता है. मैं उनके चेहरे को अपलक निहारता जा रहा था. वे कह रहे थे कि तुम कल सवेरे खेत की ओर जाना. देखना, तब तक हरा अपना सारा हरापन लौटा लायेगा, जो धूप ने उससे छीन ली है.
घंटे भर की बारिश से वह इतना हरापन अपने पास जमा कर लेगा कि अगर आनेवाले दस-पंद्रह दिनों तक फिर उसे धूप के साथ उलझना पड़ जाये, तो वह उससे जूझेगा और हार नहीं मानेगा. उनका कहना था कि यह उसके जड़ से जुड़े होने के कारण संभव होता है. जो जड़ से जुड़े होते हैं, उन्हें हरापन लौटने में वक्त नहीं लगता है!

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