परिवार का बड़ा लड़का

क्षमा शर्मावरिष्ठ पत्रकारkshamasharma1@gmail.com बड़े भाई साहब इकलौते नहीं थे, जिन पर अपने छह भाई-बहनों को पालने, पढ़ाने, लिखाने, शादी की जिम्मेदारी थी, बल्कि घर के बड़े लड़के अकसर इसी भूमिका में नजर आते थे. परिवार के बड़े लड़के के रूप में राम के आदर्श व्यवहार को उल्लिखित किया जाता था कि कैसे परिवार के लिए […]

क्षमा शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
kshamasharma1@gmail.com

बड़े भाई साहब इकलौते नहीं थे, जिन पर अपने छह भाई-बहनों को पालने, पढ़ाने, लिखाने, शादी की जिम्मेदारी थी, बल्कि घर के बड़े लड़के अकसर इसी भूमिका में नजर आते थे. परिवार के बड़े लड़के के रूप में राम के आदर्श व्यवहार को उल्लिखित किया जाता था कि कैसे परिवार के लिए उन्होंने जिंदगीभर दुख झेला.
परिवार बना रहे, इसलिए वनवास तक चले गये. बाद में अरसे तक हिंदी फिल्मों में इस बड़े लड़के या बड़े भाई की ऐसी ही भूमिका दिखायी देती रही. साहित्य में भी अरसे तक संयुक्त परिवार और बड़े लड़के दिखायी देते रहे.
उन दिनों के परिवारों को देख लगता है कि संयुक्त परिवारों में सबसे बड़े लड़के पैदा ही इसलिए होते थे कि बचपन से ही परिवार की डोर को थामे रहें. डोर टूटने लगे तो खुद हर तरह का बलिदान देकर उसे बचाएं. घर में बड़े लड़के का मतलब था परिवार का सारा बोझ उसके कंधे पर आना और जिंदगी भर जिम्मेदारियों को निभाना.
बड़े होने के कारण छोटों की हर ज्यादती को बिना कुछ कहे झेलना. माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची से हमेशा सुनना कि तुम बड़े हो और यह दोहराया जाना कि- क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात.
छोटे भी उत्पात मचाते ही रहते थे. बड़ों को यह शिक्षा घुट्टी में पिलायी जाती थी कि वे कभी अपने बारे में न सोचें, क्योंकि इससे वे स्वार्थी कहलायेंगे और समाज में उनकी निंदा होगी. समाज के भय का कोड़ा गाहे-बगाहे इन बड़े लड़कों की पीठ पर डराने के लिए पड़ता रहता था. यह भी सोचते थे कि जल्दी से पढ़-लिख कर काम पर लग जायें, जिससे पिता की जिम्मेदारियों को हलका कर सकें.
ऐसे में जब परिवार के बड़े लड़के की शादी हो जाती थी, तो परिवार के लोगों को लगता था कि अब उसका ध्यान अपनी पत्नी और बाल-बच्चों में लग जायेगा और वह अपने परिवार को भूल जायेगा. बहुत से मामलों में ऐसा होता भी था. वैसे भी जिस परिवार को बनाया है, उसकी जिम्मेदारी तो उसे निभानी ही होती थी, लेकिन उसकी अपनी जिंदगी भी तो थी.
आरोप-प्रत्यारोप का दौर ऐसा भी होता था कि घर के जिस बड़े लड़के को देवता बनाने और उसे मातृ-पितृभक्त कहने की कहानियां घर वाले बढ़ा-चढ़ा कर दिग-दिगंत में फैलाते थे, उसे ही कुछ मामूली कारणों से नाराज होकर खलनायक बना दिया जाता था.
हालांकि परिवार की राजनीति में फंसे ये बेचारे बड़े लड़के परिवार को बिल्कुल भूल जाते हों, ऐसा भी नहीं था. लेकिन घर वालों की बढ़ी उम्मीदें उनसे मांग करती थीं कि वे करें तो सब कुछ, लेकिन कभी शिकायत न करें.
परिवार उनसे हमेशा शिकायत करके उन्हें रक्षात्मक बनाता रहे और इस तरह उन पर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ता रहे. आज परिवार की टूट से ऐसी बातें कम दिखायी देती हैं. वैसे भी परिवार छोटे होने लगे हैं. माता-पिता भी अब इतने होशियार हो गये हैं कि वे अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए दूसरों का मुंह नहीं जोहते. खुद के संसाधन जुटाने की कोशिश करते हैं.

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