गांव की बस

मिथिलेश कु. राय युवा कवि mithileshray82@gmail.com शहर से बस को निकलने में तकरीबन बीस मिनट का समय लग जाता है. इस बीच आंखों के सामने सैकड़ों तरह के दृश्य आते हैं और बड़ी तेजी से गुजर जाते हैं. शहर छोटा हो तब भी उसके पास भीड़ बेतहाशा होती है न. बस चार कदम रेंगती है […]

मिथिलेश कु. राय

युवा कवि

mithileshray82@gmail.com

शहर से बस को निकलने में तकरीबन बीस मिनट का समय लग जाता है. इस बीच आंखों के सामने सैकड़ों तरह के दृश्य आते हैं और बड़ी तेजी से गुजर जाते हैं. शहर छोटा हो तब भी उसके पास भीड़ बेतहाशा होती है न. बस चार कदम रेंगती है और भीड़ में फंस जाती है.

बस भोंपू बजाती है, लेकिन इससे शहर की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता. शहर की भीड़ बड़ी ढीठ होती है. वह भोंपू सुनती रहती है और अपनी जगह पर जमी रहती है. बस में बैठे लोग खिड़की से झांकते हैं और भीड़ की लंबाई देखकर आहें भरने लगते हैं. वे भीड़ को कोसते हैं और चेहरे पर पसर आये पसीने को पोंछते रहते हैं.

शहर में बस तीन-चार जगहों पर सवारी उठाती है. दो-तीन जगहों पर तो बस कांप भी जाती है. एक तो उस चौराहे पर जहां चारों तरफ से लोग आने-जाने की जल्दी में रहते हैं, और एक रेलवे ढाला के पास. अपने तई बस इस हिसाब से चलती है कि रेल उसके काम में टांग न अड़ाये.

लेकिन बस अक्सर वहां पहुंचने से पहले चौराहे के पास फंस जाती है और लेट हो जाती है. फिर क्या. इंतजार. रेल जायेगी, फाटक खुलेगा, फिर वाहनों का रेला सरकेगा, तब बस धीरे-धीरे चलेगी. तब तक यात्री क्या करेंगे. खीजेंगे. रेल के आने और वहां से जाने का इंतजार करेंगे. गाड़ियों के भोंपू की आवाज सुनेंगे. खिड़की से झांकेंगे और देखेंगे कि जिंदगी कैसे रेंग रही है. जिंदगी कैसे रुक गयी है. कई तरह की गंध आयेगी. उसे महसूसेंगे. उधर गंदगी का ढेर पड़ा है.

वहां एक होटल है. उत्तर की ओर लोहे का ग्रिल बन रहा है. एक लड़का लौह-चदरे को पीटे जा रहा है. सड़क किनारे ईख का जूस निकालने की मशीन लगी हुई है. वह भड़भड़ा रही है. यही सब देखेंगे. सुनेंगे. खड़ा यात्री देह पर झुकने लगेगा, तो उसे डपटेंगे. कोई नया यात्री चढ़ेगा, तो उसको देखेंगे. वह जब कंडक्टर से यह पूछेगा कि सीट दोगे, तो यह सुनकर वे मुसकुराने लगेंगे.

बस जब हिचकती हुई राजमार्ग पर आ जायेगी, तो सबकी जान में जान भी आ जायेगी. यात्रियों के चेहरे से यही लगेगा कि कोई मुराद पूरी हो गयी हो. बस वाला पुराने नगमे का कैसेट चढ़ा देगा. रफी या मुकेश के गाने कानों तक आने लगेंगे. चेहरे पर जो खीज उत्पन्न हुई थी, वह धीरे-धीरे गायब होने लगेगी. लोग बाहर की और झांकने लगेंगे. दृश्य बदल चुका है.

शोर धीरे-धीरे कम हो रहा है. मिक्स होकर कई तरह की गंध जो नाक से लिपट गयी थी, वह अब मिट रही है. खिड़की से झांकने पर सामने धान के खेत नजर आने लगेंगे. धान की जड़ में पानी नजर आने लगेगा. दूर झुका हुआ आकाश का रंग थोड़ा काला लगेगा. खेतों के मेड़ पर खड़ा पेड़ दिखेगा. गाय-भैंस चराते कुछ लोग नजर आयेंगे. बांस की झाड़ियां ध्यान खींचने लगेंगी.

अब बस रफ्तार पकड़ ली है. अंदर रफी, किशोर, मुकेश, लता या आशा के ही गीत बज रहे हैं. सारी खिड़कियां ढंग से खोल दी गयी हैं. बस के अंदर स्वच्छ हवा भर गयी है. चेहरे से शिकन हट रहा है. आंखों को झपकी आने लगी है…!

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