मॉनसून में शहरों की सूरत नरक के समान हो गयी है. शहरीकरण नागरिकों के लिए एक अभिशाप बन गया है. शहर का कोई ऐसा कोना नहीं जो गंदगी, जलजमाव व बजबजाती हुई कीचड़ से सराबोर न हो. ऐसा तब है जब एक बहुत बड़ा तंत्र शहरों के प्रशासन से जुड़ा हुआ है. विभाग के माननीय मंत्री से लेकर नगर निगम के प्रशासक तक नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए जिम्मेदार हैं.
बावजूद हम नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त हैं. आखिर सरकार का लोकल बॉडी सिस्टम ठीक से काम क्यों नहीं करता, तंत्र अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकता. किसी न किसी की जिम्मेदारी तो बनती है नागरिकों को इस नारकीय जीवन से उबारने की. उम्मीद है प्रशासन अपनी जिम्मेदारी समझेगी और नागरिक जीवन बेहतर बनेगा.
राजेश कुमार सिंह, एकमा (सारण)
