महानगरों की बाढ़

साढ़े चार दशकों में सर्वाधिक बारिश से देश की वित्तीय राजधानी मुंबई में आयी बाढ़ ने 2005 की विभीषिका की याद ताजा कर दी है, जिसमें करीब 11 सौ लोग मारे गये थे. राज्य सरकार और महानगरपालिका का दावा है कि बाढ़ से निपटने की तैयारी पुख्ता थी, किंतु जलवायु परिवर्तन की वजह से हुई […]

साढ़े चार दशकों में सर्वाधिक बारिश से देश की वित्तीय राजधानी मुंबई में आयी बाढ़ ने 2005 की विभीषिका की याद ताजा कर दी है, जिसमें करीब 11 सौ लोग मारे गये थे. राज्य सरकार और महानगरपालिका का दावा है कि बाढ़ से निपटने की तैयारी पुख्ता थी, किंतु जलवायु परिवर्तन की वजह से हुई बहुत ज्यादा बारिश से इंतजाम नाकाफी साबित हुए हैं. दिल्ली में आम तौर पर जितना पानी सालभर में बरसता है, उससे अधिक बारिश मुंबई में पिछले चार दिनों में ही हो चुकी है और अब भी हो रही है. मौसम के मिजाज में बदलाव से सूखे और बाढ़ जैसी आपदाएं ज्यादा हो रही हैं. एक दशक से मुंबई में मॉनसून का हिसाब काफी बदल गया है.

पहले 120 दिनों का यह दौर होता था, जो अब घटकर सिर्फ 70 दिनों का रह गया है, लेकिन बारिश की मात्रा में औसतन दुगुनी बढ़ोतरी हो गयी है. साल 2015 में बाढ़ से तबाह चेन्नई आज भयावह सूखे की चपेट में हैं. लेकिन क्या सचमुच बाढ़ का सामना करने के लिए समुचित उपाय किये जाते हैं? नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में इन तैयारियों में देरी, लापरवाही और गड़बड़ियों की शिकायत दर्ज की गयी है. पिछली बाढ़ के बाद की परियोजनाएं करीब डेढ़ दशक बाद भी पूरी नहीं हो सकी हैं.

नतीजतन हर साल बरसात में पानी भरने और कुछ इलाकों के डूबने की घटनाएं होती रहती हैं. यह बेहद चिंताजनक है कि मुंबई समेत देश के शहरी इलाकों के बढ़ने, पानी भरने और निकासी की जगहों पर बसने तथा नदी-नालों में कचरा जमा होने की समस्या पर सरकारों और लोगों का रवैया गंभीर नहीं है. जून में एक बूंद बारिश के लिए तरसती दिल्ली में इस हफ्ते मॉनसून आ सकता है, पर इस देरी के बावजूद नालों को साफ करने का काम अधूरा है.

ठीक से निकासी नहीं होने से कई इलाकों में पानी भर जाने की दिक्कत हर साल होती है. दिल्ली के निकास तंत्र में 1976 के बाद से ठोस बदलाव नहीं हुआ है, जबकि आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, शहर की आबादी में 43 सालों में 280 फीसदी की बढ़ोतरी हो चुकी है. शहरों में बाढ़ का मुख्य कारण लचर प्रबंधन और पारिस्थितिकी की उपेक्षा है. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार लापरवाह शहरीकरण किसी देश की अर्थव्यवस्था को हर साल तीन फीसदी तक का नुकसान पहुंचा सकता है.

आज हमारे देश की एक-तिहाई से अधिक आबादी शहरों में बसती है. दुनिया के दस सबसे बड़े शहरों में से तीन- दिल्ली, मुंबई और कोलकाता- भारत में हैं. तेजी से बढ़ते तीन शहर- गाजियाबाद, सूरत और फरीदाबाद- भी यहीं हैं. चंडीगढ़ और भुवनेश्वर जैसे योजनाबद्ध तरीके से बसाये गये शहरों में भी आबादी का दबाव बढ़ रहा है. ये शहर भी पिछले एक-दो सालों में बाढ़ से परेशान हो चुके हैं. हमारा देश तेज शहरीकरण के दौर से गुजर रहा है. आनेवाले कल के हिसाब से समुचित नीतियों और नियमन की जरूरत है.

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