सन्नी कुमार
टिप्पणीकार
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लोक जीवन का चटक रंग कैसे समय के साथ धूसर हो रहा है, इसे महसूस करना हो, तो अपने परिवेश को टटोलने से बेहतर कुछ भी नहीं.अपने आस-पास होनेवाले विवाह को ही देखें, तो अब विवाह गीत गाती कितनी स्त्रियों को हम सुन पाते हैं? और अगर कहीं-कहीं सुन भी पा रहे हैं, तो नयी पीढ़ी की सहभागिता और नये गीत कितने हैं? होली में फाग गाते पुरुषों की कितनी टोली हमें दिखती है? अगर कुछ गिनने लायक अपवाद शेष रह भी गये हैं, तो इसमें नया क्या शामिल हो रहा है?
ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि ग्रामीण जीवन को अभिव्यक्त करनेवाले वैविध्यपूर्ण स्वर क्रमशः मद्धिम पड़ते जा रहे हैं. बहुत संभव है कि समय के साथ यह समाप्त हो जाये. तो क्या इसके समाप्त हो जाने के कुछ मायने भी हैं? या यह एक स्वाभाविक मृत्यु है, जिसका शोक मनाना नॉस्टेल्जिया मात्र है? कोई सांस्कृतिक परिवेश हमेशा एक जैसा ही रहे, यह जरूरी नहीं. समय के साथ उसमें नयी कोपलें फूटती हैं और वह नयी हरियाली ग्रहण कर लेता है.
किंतु ग्राम जीवन के साथ ऐसा नहीं हुआ है. यहां नयी कोपल नहीं फूटी, बल्कि बाह्य प्रभाव से नये विकार उत्पन्न हुए. इसलिए यह कोई स्वाभाविक मृत्यु नहीं है क्योंकि ग्राम जीवन की बुनियादी संरचना में कोई परिवर्तन नहीं आया है.
यह कमोबेश उसी स्वरूप में बना हुआ है किंतु इस जीवन से जुड़ा सांस्कृतिक पहलू आमूलचूल ढंग से बदल गया. दरअसल, उदारीकरण व वैश्वीकरण ने न केवल अपनी आर्थिक संपन्नता की ओर ध्यान आकर्षित किया, बल्कि उसने इससे जुड़ी हुई सांस्कृतिक जीवन को भी मानक रूप दे दिया.
स्वाभाविक रूप से इस ‘श्रेष्ठ जीवन’ को अपनाने की चाह गांवों तक भी पहुंची. नया चोला धारण करने के लिए जरूरी था कि पुराने वस्त्र त्याग दिये जायें. फिर इस नयेपन को प्रचारित करने की बारंबारता इतनी तीव्र थी कि पुराना स्वत: पीछे छूटता चला गया. इस प्रक्रिया ने सांस्कृतिक वैविध्य को समाप्त कर एकलता स्थापित की, जिससे स्थानीय यथार्थ की अभिव्यक्ति कमजोर हुई. इसलिए इस बदलाव के महत्वपूर्ण मायने हैं.
बाहरी दुनिया से थोपी गयी इस एकलता ने स्थानीयता को समाप्त कर दिया. जीवन के विभिन्न हिस्सों को एक ही तरीके से देखा जाने लगा, जिसने विसंगतियां पैदा की. अब हर जगह एक जैसे रंग से होली खेली जा रही है और एक-से फिल्मी गीतों से अलग-अलग दुनिया के लोग खुश हैं.
स्थानीय सामाजिक संबंधों की जटिलता लिये विवाह गीतों का स्थान सार्वभौमिक सामाजिक मान्यता पर टिके गीत ने ले ली. स्थानीय परिवेश और उत्सव का संबंध टूट गया. स्वयं को अभिव्यक्त करने की मौलिकता नष्ट हो गयी. यही वजह है कि प्रवासन की समस्या के बने रहने के बावजूद नये लोकगीत नहीं रचे जा रहे हैं.
पर्यावरण संरक्षण से लेकर धार्मिक जीवन तक में स्थानीय अभिव्यक्ति की बजाय केंद्रीय अभिव्यक्ति हावी हो रही है. इस प्रकार लोक को ग्लोबल नजरिये से देखने की प्रवृत्ति विकसित हुई. इस विरोधाभास के दुष्प्रभाव भी इसी समय दिखने लगे हैं.
