बंगाल में चुनावी हिंसा के बीच एक शिक्षण संस्थान का रणक्षेत्र में तब्दील होना बेहद चिंताजनक है. सवाल यह नहीं है कि मूर्ति किसने तोड़ी, सवाल यह है कि राजनीति इस देश को कहां ले जा कर छोड़ेगी. चुनाव के दौरान हिंसा के लिए मशहूर बंगाल आज भी अपने कलंक से उबर नहीं पाया है.
ईश्वरचंद विद्यासागर जितने महत्वपूर्ण देश के लिए थे, उतने शायद अकेला बंगप्रदेश के लिए भी थे. ऐसे में यह बात कल्पना के परे लगती है कि बंगाल के लोगों ने विद्यासागर की मूर्ति को क्षतिग्रस्त किया है. वे पत्थर चाहे अंदर के थे या बाहर के, मगर निश्चित रूप से राजनीतिक थे.
देश की अनमोल धरोहरों पर हमला हमारी भावी राजनीति का चरित्र और चेहरा साफ उजागर करता है. भले ही ऐसे हमलों से किसी को सियासी लाभ मिले, मगर लोकतंत्र के बहते लहू को रोक पाना मुमकिन नहीं होगा. बेशक सत्ता की खींच-तान हो, मगर महापुरुषों की मूर्तियों पर की जाने वाली राजनीति देश को गर्त में न ले जाये.
एमके मिश्रा, रातू, रांची
