कुछ दिन पहले आपसी बातचीत का हवाला देते हुए पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने बताया था कि मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन की बढ़त से चिंतित हैं. इस चिंता से सहमति जताते हुए उन्होंने दोनों देशों की तुलना करते हुए यह भी कहा था कि चार दशकों में चीन ने युद्ध पर एक पैसा भी बर्बाद नहीं किया है.
साल 1979 में कार्टर के कार्यकाल में ही दोनों देशों के बीच व्यापारिक सहयोग का दौर शुरू हुआ था. आज चीन एक वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बन चुका है तथा यह उपलब्धि कारोबार के जरिये हासिल हुई है. परंतु, इसका यह मतलब कतई नहीं है कि इन दशकों में उसने अपनी सामरिक तैयारी पर ध्यान नहीं दिया है.
साल 2011 में लीबिया के गृहयुद्ध के दौरान चीन ने अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए वायु सेना के अत्याधुनिक जहाजों और नौसैनिक बेड़े को भेजा था, जबकि उसके नागरिकों पर कोई बड़ा खतरा भी नहीं था और उनमें से अधिकतर लीबिया से निकल चुके थे. यह पहला मौका था, जब चीन ने किसी सुदूर क्षेत्र में ऐसे सैन्य विमान और युद्धपोत भेजे थे. दरअसल, यह घटना पूर्व चीनी नेता देंग जियाओ पिंग के उस निर्देश से अलग होने का संकेत थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि चीन को अपनी ताकत दिखाने से परहेज करना चाहिए और चुपचाप अपनी बारी का इंतजार करना चाहिए.
लीबिया की कार्रवाई से दस साल पहले चीन ऐसा कदम नहीं उठा सकता था, लेकिन अब तो उसके बाद भी करीब एक दशक का समय बीतने को है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग एशिया और अन्य महादेशों में आर्थिक वर्चस्व के विस्तार के लिए लगातार कोशिश कर रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेल्ट-रोड परियोजना और चीन को निर्माण-आधारित अर्थव्यवस्था बनाने पर उनका जोर इसी कोशिश का हिस्सा है. इसी के साथ उन्होंने चीनी सेना के ढांचे में भी बड़े फेर-बदल किये हैं.
जिनपिंग के भाषणों में अपमानजनक बाहरी हमलों की छाया से निकलकर अब एशिया की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी महान चीनी सभ्यता का उल्लेख आम हो गया है. राष्ट्रपति के तेवर उनकी बढ़ती महत्वाकांक्षा को इंगित करते हैं. साउथ चाइना सी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन निरंतर आक्रामक होता जा रहा है. वित्तीय निवेश, वाणिज्य और बड़े देश की छवि के सहारे वह पड़ोसी देशों के साथ अपने संबंधों को भी मजबूत कर रहा है. इस क्षेत्र में अमेरिका की गहरी पैठ है और उसके अनेक सैन्य ठिकाने स्थापित हैं. लेकिन अमेरिकी संरक्षणवाद की नीति से पैदा हुए व्यापार युद्ध से चीन विचलित होता हुआ नहीं दिख रहा है.
अमेरिका और चीन की खींचतान पर भारत को पैनी नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि चीन दक्षिणी एशिया में अपनी पहुंच बना चुका है. सीमा विवादों के अलावा द्विपक्षीय व्यापार का संतुलन भी चीन की ओर झुका हुआ है. ऐसे में भारत को एशिया को बहुपक्षीय बनाने की दिशा में कूटनीतिक और कारोबारी सक्रियता को गति देने की जरूरत है.
