प्राचीनकाल से ही शिक्षकों को आदर एवं सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा है, लेकिन वर्तमान में पारा शिक्षक आदर एवं सम्मान की बाट जोह रहे हैं. इनसे एक अप्रशिक्षित मजदूर की दैनिक मजदूरी से भी कम राशि पर काम लिया जा रहा है. उस पर दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि वह मानदेय भी इन्हें समय पर नहीं मिलता है.
विगत चार माह से इनका मानदेय लंबित है, लेकिन अभी तक विभाग एवं मंत्री ने इस ओर ध्यान देना भी जरूरी नहीं समझा है. कई सर्वेक्षणों से यह साबित हो चुका है कि इन्होंने बच्चों को स्कूल तक लाने में अथक प्रयास किया है, जिससे स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति में अभूतपूर्व वृद्घि हुई है. हमारे नीति निर्माताओं को इस ओर ध्यान देना चाहिए कि जो दूसरों के घरों को रोशन कर रहे हैं, अगर उनका ही घर अंधेरे में डूबा रहेगा तो वे अपना काम अच्छे से कैसे और कब तक कर पायेंगे.
शरत कांत, ई-मेल स
