जनसाधारण से लेकर वीआइपी तक एसडीओ कोर्ट से लेकर सर्वोच्च न्यायालय में न्याय की आस में पहुंचते हैं, जहां रसूखदार लोग तो अपने केस की पैरवी के लिए मोटी फीस चुकाकर अच्छे वकील रख लेते हैं, परंतु कानूनी जानकारी नहीं होने के कारण साधारण लोग शीघ्र न्याय पाने की लालसा में ऐसे वकील के फीस तभी भर पाते हैं, जब जमीन या घर या औरतों के गहने गिरवी रखते हैं या बेच देते हैं. इस पर भी केस जीत ही जायेंगे, ऐसी कोई गारंटी नहीं रहती. हालांकि गरीब मुवक्किल के लिए संविधान ने मुफ्त वकील की व्यवस्था की है, किंतु ऐसे पैरवीकार अधिवक्ता की कानूनी जानकारी अल्प ही रहती है.
मैंने विविध कोर्टों के वकीलों के फीस निर्धारण को लेकर ‘बार कौंसिल ऑफ इंडिया’ को पत्र लिखा, किंतु फाइनल जवाब अबतक पेंडिंग है. भारत के विधि मंत्री रहे राम जेठमलानी भी एक बहस के लिए ₹पांच लाख से ऊपर लेते हैं, तो दूसरों की बात करना ही बेमानी है.
प्रो सदानंद पॉल, नवाबगंज, मनिहारी (कटिहार)
