ज्यां द्रेज
विसिटिंग प्रोफेसर,
अर्थशास्त्र विभाग, रांची विवि
jaandaraz@riseup.net
सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही की कमी के कारण आम नागरिकों को बहुत समस्या झेलनी पड़ती है. कभी रिश्वत देनी पड़ती है, कभी सरकारी ऑफिस का चक्कर काटना पड़ता है, कभी सार्वजनिक सुविधा छोड़कर निजी अस्पताल या निजी स्कूल में बजट से ज्यादा खर्च करना पड़ता है. स्कूल के बच्चे, नरेगा मजदूर, मरीज, पेंशन से वंचित विधवा- सभी चाहते हैं कि सरकारी कर्मचारी अपनी ड्यूटी करें, नहीं तो उनके खिलाफ कार्रवाई हो.
पिछले कुछ वर्षों में सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही लाने की जरूरत के बारे में काफी चर्चा हुई और इस दिशा में कई कदम भी उठाये गये. मसलन, आरटीआई से हर नागरिक को सरकार से सूचना लेने का अधिकार मिला.
कई राज्यों में शिकायत निवारण की सुविधाएं उपलब्ध की गयीं. कुछ राज्यों में शिकायत निवारण के लिए कानून भी बनाये गये. इन कदमों का प्रभाव कितना होगा, यह देखने की बात है, फिर भी इनको जवाबदेही की ओर एक उपयोगी शुरुआत मानी जा सकती है.
जवाबदेही का रास्ता सही है, लेकिन उसकी एक सीमा भी है. जवाबदेही को सरकारी कर्मचारियों के लिए इनाम व सजा की व्यवस्था बनाने का एक प्रयास समझा जा सकता है. लेकिन सरकारी कर्मचारी कोई बैल तो नहीं है, जिसकी निगरानी गाजर और डंडा से की जा सकती है. कर्मचारी को कई बार खुद भी कुछ सोचना या करना पड़ता है.
स्कूल के अध्यापक कितने बजे आते-जाते हैं, इसकी निगरानी जरूर की जा सकती है और अनुपस्थिति कम करने के लिए कई तरह के इनाम और सजा हो सकते हैं. लेकिन अध्यापक दिल से पढ़ायें, इसके लिए क्या निगरानी हो सकती है?
कुछ अर्थशास्त्रियों का जवाब है कि अगर अध्यापक का वेतन छात्रों के परीक्षा के अंकों से जोड़ेंगे, तो अध्यापक ध्यान से पढ़ायेंगे. लेकिन शिक्षा केवल कोचिंग की बात नहीं है. शिक्षा बच्चों के संपूर्ण विकास और सेहत की बात है. अध्यापक अगर केवल परीक्षा के अंकों पर ध्यान देंगे तो इससे शिक्षा नहीं होगी.
इसी तरह यदि नर्स का काम देखें, तो उसकी उपस्थिति और रजिस्टर रखरखाव की निगरानी की जा सकती है, लेकिन मरीज से वह कैसे बात करती है, कहां सुई लगाती है और दवा कैसे पिलाती है, इन चीजों की देख-रेख करना मुश्किल है. नर्स से हम उम्मीद करते हैं कि वह अपना काम अपने आप ध्यान से करें. दूसरे शब्दों में, हम नर्स से केवल जवाबदेही नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की अपेक्षा भी करते हैं.
शायद आपको लगेगा कि सरकारी कर्मचारियों से जिम्मेदारी की उम्मीद रखना भोलापन की बात है. फिर भी, याद रखिये- दुनिया के श्रेष्ठ अस्पताल, विश्वविद्यालय, पुस्तकालय, संग्रहालय इत्यादि ऐसे लोगों के द्वारा प्रबंधित हैं, जो अपना काम दिल से और जनता के हित में करते हैं.
इंग्लैंड या क्यूबा की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा, इबोला वायरस का नियंत्रण, ज्ञान-विज्ञान का विकास, फंसे खनिकों का बचाव, इन सारे कामों में जिम्मेदारी की भावना का प्रभाव दिखता है.
भारत में भी जिम्मेदारी का व्यवहार इधर-उधर दिखता रहता है. केरल की नर्स पूरे देश में सेवा करती हुई दिखती है. इसका कारण यह नहीं है कि केरल की नर्स के ऊपर जवाबदेही का खास प्रावधान लगाया गया है.
खास बात यह है कि केरल की नर्सों के बीच में जिम्मेदारी की कार्य संस्कृति बन गयी है. पिछले साल जब केरल बाढ़ से पीड़ित हुआ था, तब न केवल नर्सें, बल्कि उनके साथ हर सरकारी कर्मचारी और आम नागरिक भी राहत अभियान में दिन-रात शामिल हुए थे.
बिहार और झारखंड जैसे राज्यों की सार्वजनिक संस्थाओं में इस तरह की कार्य संस्कृति बनाने में समय लगेगा. मुझे पिछली दिवाली की याद आती है. उस दिन मैं भोर में रांची विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग जा रहा था. अचानक कुलपति मिले, जबकि आस-पास और कोई नहीं था.
कुलपति साहब इधर-उधर विश्वविद्यालय के पेड़-पौधों के स्वास्थ्य की देख-रेख कर रहे थे. बढ़ता हुआ पौधा और खिलते हुए फूलों को देखते हुए खुशी से मुस्कुराते थे. रांची विवि के अर्थशास्त्र विभाग की सबसे कम कमानेवाली कर्मचारी भी अपना काम दिल से करती हैं.
वे रोज समय पर आती हैं और दिनभर मेहनत करती हैं. जब मेरे ऑफिस की सफाई करती हैं, तो पूरी ताकत लगाती हैं, मानो उन्हीं के घर में मेहमान आनेवाले हों. उन्हें देख मैं भी मकड़ी के जाले निकालता हूं और हम दोनों मिलकर अच्छी तरह किये काम का आनंद लेते हैं.
मुझे विश्वास है कि हर विवि के हर विभाग में ऐसे लोग होंगे, जो अच्छा काम करते हैं. उनसे उम्मीद है कि आज नहीं तो कल शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही के साथ जिम्मेदारी की कार्य संस्कृति आयेगी.
जिस तरह एक बैलगाड़ी में दो बैल बराबर होते हैं, वैसे ही सार्वजनिक संस्थाओं को ठीक से चलाने के लिए जवाबदेही और जिम्मेदारी दोनों की जरूरत है. कुछ हद तक दोनों का चारा एक ही होता है. उदाहरण के लिए, पारदर्शिता दोनों की मदद करती है. लेकिन, कभी कभी जिम्मेदारी का अपना चारा होता है.
विश्वविद्यालय में पेड़-पौधे लगाने से जवाबदेही नहीं बढ़ती, लेकिन पर्यावरण की सुंदरता शायद कुछ लोगों को अपना काम दिल से करने में मदद करती है. उसी तरह सहयोग, बराबरी, दोस्ती, मस्ती का माहौल बनाने से जिम्मेदारी की संस्कृति का लालन-पालन हो सकता है. केवल जवाबदेही पर ध्यान देने से ही बैलगाड़ी बहुत दूर तक नहीं पहुंचेगी.
