जब नशीली आंखें, बदबू भरा मुख, लड़खड़ाते कदम, कीचड़ से सना शरीर और बहकती वाणी वाले व्यक्ति नजर आते हैं, तब अच्छे मानव की आत्मा उसके हृदय को कचोटने लगती है. वह सोचने लगता है कि मद्य का सेवन मानव को मानव नहीं रहने देता.
मद्य सेवन मादकता तो प्रदान करता ही है, इसी के साथ वह व्यक्तित्व के विनाश, निर्धनता की वृद्धि और मृत्यु के द्वार भी खोलता है. अत: इस आसुरी प्रवृत्ति को समाप्त करना परम आवश्यक है. मद्यपान से व्यक्ति कुछ क्षण को अपने को एवं संसार को भूल जाता है. मजदूर वर्ग अधिकतर इसी प्रवृत्ति के कारण मद्यपान करते हैं. दीपावली, होली, ईद जैसे कुछ धार्मिक उत्सवों पर लोग विशेष रूप से मद्यपान करते हैं, जो कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता.
मो जमील, अंधराठाढ़ी (मधुबनी)
