क्षमा शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
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बहुत साल पहले छोटी बहन और बड़ा भाई साथ-साथ जा रहे थे. अचानक सामने से एक सज्जन आये. बहन ने कहा- अंकल नमस्ते. आगे जाकर भाई ने बहन से कहा-अपनी नमस्ते बचाकर रखा कर. यह क्या कि हर-एक के सामने हाथ जोड़ती फिरती है. भाई की उम्र कोई ज्यादा नहीं थी, लेकिन उसके मन में यह बात कैसे आयी होगी कि नमस्ते हर एक से नहीं करनी चाहिए. उसे किसने यह सिखाया होगा. उसने जरूर बड़ों को ऐसा करते देखा होगा.
अपने यहां नमस्ते, नमस्कार, जय राम जी की, राम-राम, अदाब, सलाम, सतश्री अकाल आदि करने के लिए यह जरूरी नहीं कि जिससे यह किया जा रहा है, वह परिचित ही हो. उससे अपना कोई काम सध सकता हो.
यहां तक कि विदेशों में भी लोग रास्ते चलते लोगों को हाय-हलो बोलते चलते हैं. नमस्कार या अन्य संबोधन दूसरे को आदर देने के लिए होते हैं. लेकिन कई दशकों से नजरें बचाने और कहीं नमस्कार न करना पड़े, इसके लिए बेपहचान हो जाने का भाव बढ़ता जा रहा है. ऐसा क्यों हो रहा है, समझ में नहीं आता. दो लोग एक-दूसरे को पहचानते हैं, लेकिन रास्ता बदलकर, दूसरी तरफ देखते हुए निकल जाते हैं. मोबाइल पर जबर्दस्ती व्यस्त होने का नाटक करते हैं.
बसों या मेट्रो में खिड़की से बाहर ऐसे देखने लगते हैं, जैसे वहां कोई अद्भुत दृश्य दिख रहा हो, या आंखें बंद करके ऐसे दिखाते हैं, जैसे सो रहे हों. ये बातें सिर्फ पुरुषों में ही नहीं, इन दिनों महिलाओं में भी खूब पायी जाती हैं. जब कभी किसी ने यह पूछ दिया कि आपने नमस्ते का जवाब नहीं दिया, तो वे कहते हैं- ओह सुन नहीं पाया, कुछ सोच रहा होऊंगा.
कई बार तो ऐसा भी होता है कि महीनों तक आपस में अच्छी-भली बातें होती हैं. सुख-दुख शेयर किये जाते हैं. चाय-काॅफी साथ पी जाती है. जन्मदिन मनाये जाते हैं. फिर एक दिन ऐसा आता है कि सामने से आ रहे हैं, लेकिन देख आर-पार रहे हैं, जैसे कि कभी मिले ही न हों. जानते ही न हों. तकनीक ने तेजी से दुनिया को एक ग्राम में बदल दिया है. कम्युनिकेशन जितना बढ़ चला है, हम खुद को दुनिया से उतना ही काटते जा रहे हैं, जैसे किसी को जानते-पहचानते ही नहीं. नमस्ते और दुआ-सलाम तो दूर की बात है. जब कोई विपत्ति आती है, बीमार पड़ते हैं, तो ऐसे लोग भारी दुख मनाते देखे जाते हैं, जो कहते हैं कि हमारे समाज को यह क्या हो गया कि सब एक-दूसरे की अनदेखी कर रहे हैं.
अरे भाई जब आपने बहुतों की अनदेखी की थी, पहचानते हुए भी नहीं पहचाना था, नमस्ते को भी किसी पद से जोड़ दिया था कि वह बड़ा पद वाला है, उसे नमस्ते करनी चाहिए और छोटे पद वाले को भूल जाना चाहिए, तब भी तो किसी ने आपके बारे में ऐसा ही सोचा होगा. अब जब खुद पर आन पड़ी है तो शिकायत कैसी!
जीवन की पाठशाला में पढ़े गये अध्यायों को भुला दिया जाता है. नहीं तो आज लोग किसी को अभिवादन करने को अपनी या उसकी हैसियत से क्यों जोड़ते. पद तो आते-जाते हैं, जबकि एक-दूसरे का साथ हमेशा बना रह सकता है.
