भारत के बदलते परिदृश्य को देखा जाये तो पता चलता है कि आजादी के बाद भी यहां के कुछ समाज अब भी अपने अधिकार से वंचित रह गया है.
समय-समय पर किसान आंदोलन करते रहते हैं, दलित-आदिवासी अब भी संघर्षरत हैं. वर्तमान में तो जिस प्रकार से पढ़ाई की जा रही है, उसी प्रकार से अपने अधिकार के लिए संघर्ष भी. संविधान द्वारा तो आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े समाज को आरक्षण का लाभ दिया गया, पर आरक्षण व्यवस्था होने के बावजूद भी दलित-आदिवासी समाज को सामाजिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया है.
अगर सामाजिक तौर पर दलित-आदिवासी समाज को हम आपसी मतभेद अथवा मनभेद को छोड़ स्वीकार कर लें, तो हमारा समाज, सामाजिक रूप से परिवर्तन की ओर होगा. तभी हम सभी के बीच आपसी सहयोग और भाइचारे की भावना आयेगी.
नितेश कुमार सिन्हा, जानपुल चौक (मोतिहारी)
