बदहाल अस्पतालों की गरीबों पर मार

झारखंड में आम लोगों की जिंदगी को लेकर सरकार कितनी गंभीर है, इसकी बानगी देखनी हो तो राज्य के सरकारी अस्पतालों पर एक नजर डालिए. अस्पतालों से जरूरी तथा जीवनरक्षक दवाएं गायब हैं. कुत्ता काटने की दवा (रैबीज-रोधी टीका), सांप काटने की दवा, टिटनेस का टीका, एंटीबायोटिक, दर्दनिवारक वगैरह गायब हैं. कई अस्पतालों में पूरी […]

झारखंड में आम लोगों की जिंदगी को लेकर सरकार कितनी गंभीर है, इसकी बानगी देखनी हो तो राज्य के सरकारी अस्पतालों पर एक नजर डालिए. अस्पतालों से जरूरी तथा जीवनरक्षक दवाएं गायब हैं. कुत्ता काटने की दवा (रैबीज-रोधी टीका), सांप काटने की दवा, टिटनेस का टीका, एंटीबायोटिक, दर्दनिवारक वगैरह गायब हैं.

कई अस्पतालों में पूरी बेशर्मी के साथ कुत्ते की दवा न होने की सूचना का बोर्ड टांग दिया गया है. दवाओं की खरीद के लिए राज्य में अलग से एजेंसी बनी है जिसका नाम है ‘झारखंड राज्य स्वास्थ्य अवसंरचना विकास एवं खरीद निगम’. लापरवाही का आलम यह है कि इस निगम में अभी प्रबंध निदेशक (एमडी) का पद खाली पड़ा हुआ है. इसलिए यहां कोई काम नहीं हो रहा है. अगर एमडी की जिम्मेदारी अभी कोई संभाल भी ले, तो खरीद प्रक्रिया पूरी करने में कम से कम चार माह का वक्त और लगेगा. यानी, बारिश का पूरा चौमासा इन दवाओं के बिना ही निकल जायेगा. इसी वक्त में सांप कांटने की घटनाएं सबसे ज्यादा होती हैं.

छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में सांप काटने की दवा, दुकानों पर मिलनी मुश्किल होती है. ऐसे में एकमात्र सहारा सरकारी अस्पताल होते हैं. अगर वहां भी यह दवा नहीं मिलती, तो जिंदगी बचना कठिन है. इसी तरह रैबीज-रोधी टीका भी बड़े कस्बों या जिला मुख्यालयों में ही मिल पाता है. यह काफी महंगा भी है. इसे खरीद पाना निम्न आयवर्ग के लोगों के बस के बाहर है. बारिश के समय में बीमारियां खूब फैलती हैं, मलेरिया से लेकर डायरिया तक. तरह-तरह के संक्रमणों के लोग शिकार होते हैं. इनके उपचार के लिए एंटीबायोटिक की जरूरत होती है.

लेकिन दुर्भाग्य देखिए अस्पतालों में एंटी-बायोटिक भी नहीं हैं. जिन इलाकों में सुविधाएं हैं, जो लोग साधनसंपन्न हैं, वे तो निजी अस्पतालों में इलाज करा लेंगे, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में रहनेवाले तथा गरीब लोग क्या करेंगे! आज निजी अस्पतालों में इलाज कराने में मध्यमवर्गीय लोगों के पसीने छूट जाते हैं, तो गरीब वहां जाने की हिम्मत कैसे जुटायेगा! अगर चला भी जायेगा, तो उसके आर्थिक बोझ से महीनों तक नहीं उठ पायेगा. सरकार नींद से जागे और सरकारी अस्पतालों की हालत सुधारने के लिए फौरन ठोस कदम उठाये.

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