बीते जमाने की तस्वीर

अरविंद दास पत्रकार arvindkdas@gmail.com मौसम चाहे बहार का हो या फिर पतझड़ का, वह आपके मन और मिजाज पर प्रभाव डालता है. इसलिए कवियों के यहां वसंत, या कह लें कि उम्मीद के मौसम का जिक्र ज्यादा होता है. मनोवैज्ञानिक भी इस बात पर जोर देते हैं कि सुबह-शाम, धूप-छांव के कारण पड़नेवाला असर मौसमी […]

अरविंद दास

पत्रकार

arvindkdas@gmail.com

मौसम चाहे बहार का हो या फिर पतझड़ का, वह आपके मन और मिजाज पर प्रभाव डालता है. इसलिए कवियों के यहां वसंत, या कह लें कि उम्मीद के मौसम का जिक्र ज्यादा होता है. मनोवैज्ञानिक भी इस बात पर जोर देते हैं कि सुबह-शाम, धूप-छांव के कारण पड़नेवाला असर मौसमी रोगों को बढ़ावा देता है.

बहरहाल, जैसे ही ठंड की दस्तक हवाओं में होती है, मैं थोड़ा सा उदास और थोड़ा नॉस्टेल्जिक होने लगता हूं. मन बचपन की स्मृतियों, यानी गांव की ओर लौटने लगता है. हम जैसे प्रवासियों के लिए यह मौसम दशहरा, दीवाली, छठ की यादें लेकर आता है और आंंखें भीग जाती हैं.

पिछले दिनों पटना से मेरी मौसी ने मां-पापा की एक धुंधली-सी तस्वीर की मोबाइल से ली गयी तस्वीर भेजी, जो 27 साल पुरानी थी. मां-पापा की एक साथ पुराने जमाने की ऐसी तस्वीर बमुश्किल एक-दो ही हैं.

कहते हैं कि तस्वीर बीते समय के साथ एक समझौते की तरह होती है. जैसे ही मैंने मां को यह तस्वीर दिखायी, मां चौंककर बोली- यह तो मैं हूं. फिर उसने कहा कि मैंने इसे अपनी साड़ी से पहचाना.

मेरे लिए यह तस्वीर कवि आलोक धन्वा की कविता से भी जुड़ती है- एक जमाने की कविता. पापा जब भी गांव आते, तो मां के लिए साड़ी लाते थे.

आलोक धन्वा ने लिखा है- ‘मां जब भी नयी साड़ी पहनती/ गुनगुनाती रहती/ हम मां को तंग करते/ उसे दुल्हन कहते/ मां तंग नहीं होती/ बल्कि नया गुड़ देती/ गुड़ में मूंगफली के दाने भी होते…’

पापा इन दिनों अस्वस्थ रहने लगे हैं. तस्वीर देखकर मां ने कहा- आदमी भी क्या से क्या हो जाता है!

मैंने कवि आलोक धन्वा से फोन करके पूछा कि ‘एक जमाने की कविता’ पढ़ते हुए मैं भावुक हो गया, क्या लिखते हुए आप भी भावुक हुए थे? उन्होंने कहा- स्वाभाविक है. कविता अंदर से आती है. मेरी मां 1995 में चली गयी थी, जिसके बाद मैंने यह कविता लिखी. अब मां तो सिर्फ एक मेरी ही नहीं है न. भावुकता स्वाभाविक है.

मैंने उनसे कहा कि आपने लिखा है- ‘मां थी अनपढ़, लेकिन उसके पास गीतों की कमी नहीं थी/ कई बार नये गीत भी सुनाती/ रही होगी एक अनाम ग्राम कवि…’ जब मैंने उनसे कहा कि मेरी मां भी गाना गाती थी (है) शाम में और अक्सर पापा उससे गाना सुनने की फरमाइश करते थे. तो इस पर उन्होंने कहा कि देखिये, आप मेरी ही बात कह रहे हैं. फिर मैंने पूछा कि क्या यह नॉस्टेल्जिया नहीं है? तब उन्होंने जवाब दिया कि नहीं, यह महज नॉस्टेल्जिया नहीं है.

आलोक धन्वा ने कहा कि जो आदमी मां से नहीं जुड़ा है, अपने नेटिव से नहीं जुड़ा है, वह इसे महसूस नहीं कर सकता है. वह इस संवेदना को नहीं समझ सकता है.

अपने नेटिव से जुड़ाव हर बड़े कवि के यहां मिलता है. चाहे वह विद्यापति हो, रिल्के हो या नेरुदा. मुझे याद हो आया कि बाबा नागार्जुन ने भी लिखा है- ‘याद आता मुझे अपना वह तरौनी ग्राम……’

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