आर्थिक, व्यापारिक और सामरिक सहयोग के लिए गठित सात देशों के क्षेत्रीय मंच बिम्सटेक के चौथे सम्मेलन के सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेपाल में हैं.
इस आयोजन में भारत का जोर आतंकवाद से लड़ाई, क्षेत्रीय संपर्क-तंत्र के विस्तार तथा आपसी व्यापार पर कारगर योजना तैयार करने पर होगा. इस मंच के सदस्य देशों- बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, थाइलैंड, भूटान, नेपाल और भारत- में दुनिया की आबादी का करीब 22 फीसदी हिस्सा बसता है. इन देशों का सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) 2.8 ट्रिलियन डॉलर आंकी गयी है.
अगर भावी योजनाओं पर सहमति बनती है, तो यह दक्षिण-पूर्वी एशिया में शांति और समृद्धि के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा. बिम्सटेक की कामयाबी पड़ोसी देशों से भारत के संबंध और दक्षिण एशिया के आर्थिक-सामरिक समीकरणों के लिहाज से भी अहम है. फिलहाल दक्षिण एशिया देशों के संगठन- सार्क- की गतिविधियां विशेष कारगर नहीं हो पा रही हैं.
इसे क्षेत्रीय विकास का अग्रणी माध्यम बनाने के भारत के प्रयासों में पाकिस्तान के नकारात्मक रवैये ने लगातार अड़ंगा लगाया है. वह ‘सार्क’ के मंच से किये जानेवाले प्रयासों को क्षेत्रीय स्तर पर दबदबा कायम करने की भारत की रणनीति का हिस्सा मानता है. भारत की आकांक्षा है कि दक्षिण एशिया की विकास यात्रा दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़े और अपनी संभावनाओं को साकार करे.
इस आकांक्षा को किसी एक देश के रवैये का बंधक बनाकर नहीं रखा जा सकता है. लेकिन, बिम्सटेक देशों के बीच सहयोग बढ़ाने के लिए ठोस पहलकदमी के लिए भारत को कुछ बातों का ध्यान रखना होगा. एक तो भारत को पाकिस्तान के इस दुष्प्रचार को प्रभावहीन करना होगा कि भारत एशिया के इस भाग में अपना दबदबा कायम करना चाहता है.
प्रधानमंत्री ने 2015 में ही स्पष्ट कर दिया था कि दक्षिण एशिया के देशों के आपसी सहयोग को मजबूत करने की कोशिशें जारी रहेंगी, चाहे उसका मंच सार्क बने या फिर कोई और समूह, चाहे इस कोशिश में सभी संबद्ध देश शामिल हों या कुछ देश इससे अलग रहें. इस दृष्टिकोण को वास्तविकता में बदलना जरूरी है. दूसरा अहम पहलू यह है कि 2016-17 में बिम्सटेक के सचिवालय के बजट का 32 फीसदी हिस्सा भारत ने दिया था.
चूंकि अब सचिवालय का विस्तार किया जाना लाजिमी है, तो बढ़े हुए बजट की पूर्ति में भी भारत को बढ़-चढ़कर योगदान करना होगा. बिम्सटेक को लेकर भारत की प्रतिबद्धता के आकलन में यह कारक महत्वपूर्ण होगा. इस प्रकरण में चीन भी खास कारक है, जो लंबे समय से सार्क में सक्रियता की इच्छा रहता है.
अभी वह इस समूह में पर्यवेक्षक है, पर सार्क और बिम्सटेक के अनेक देश अपने हितों के कारण चीन की भूमिका का विस्तार चाहते हैं. इस संदर्भ में भारत समेत सभी देशों को सोच-समझकर काम करना होगा, अन्यथा बिम्सटेक की नियति भी सार्क की तरह हो सकती है.
