मृणाल पांडे
ग्रुप सीनियर एडिटोरियल एडवाइजर, नेशनल हेराल्ड
mrinal.pande@gmail.com
जब नेहरूयुगीन भारत में लोकतंत्र घुटनों के बल चलना सीख रहा था. आमतौर पर माना जाता था कि जैसे-जैसे लोकतांत्रिक भारत में शिक्षा की रोशनी फैलेगी, वैज्ञानिक सोच बढ़ेगा, बड़े उद्योग-धंधे पनपेंगे, बांधों का निर्माण और नहरों का जाल फैलकर अन्नपूर्णा को सीधे दरवाजे पर ले आयेगा.
और जब पेट में अन्न हाथ में चार पैसा होगा, तब शिक्षा का प्रसार और नयी पीढ़ी की मार्फत वैज्ञानिक सोच का उजाला फैल जायेगा. इसके बाद सदियों पुराने जात-पात के बंधन और तमाम किस्म के दकियानूसी धार्मिक अंधविश्वास खुद ही मिट जायेंगे, जिन्होंने सदियों से हमारे समाज को एक ठहरा हुआ और बदबूदार तालाब बनाये रखा. लेकिन, हाल की कई घटनाएं गवाह हैं कि कई बार देश के कानून बदल दिये जाएं और समृद्धि अकल्पनीय बढ़ भी जाये, तो भी प्रतिगामी जातिवादी और धार्मिक भेदभाव के बीज नष्ट नहीं होते.
बस भीतर पड़े सही समय का इंतजार करते रहते हैं. जब राजनीति और बाजार अपने हित स्वार्थों की तहत जमीन पर भेदभाव और रूढ़िवादी सोच का खाद-पानी देने लगें, तो पुराने बीज फिर नयी फुनगियां और शाखाएं फोड़कर सतह पर छा जाती हैं.
इसके कई उदाहरण हैं. साल 1955 में जब वैज्ञानिक सोच के पक्षधर नेहरू ने कहा था कि एटम बम के युग में तलवार लेकर चलने की जिद बेमतलब रस्म है, तो मास्टर तारा सिंह ने तुरंत अमृतसर में कृपाण लहरानेवालों का एक मीलों लंबा जुलूस निकाल दिया था.
उसी के बाद गुलजारीलाल नंदा के न्योते संन्यासियों ने गोवधबंदी पर हुड़दंग मचाया था. अब 21वीं सदी में फिर तलवारें लहरा कर फिल्म (पद्मावत) की रिलीज का विरोध करनेवाले या गोवधबंदी के नाम पर सड़कों पर लाठियां भांजते लोग और हिंसक कांवड़िये क्या आपको उनसे भिन्न लगते हैं?
कभी गोवध तो कभी लव जिहाद का झूठा भय दिखाकर हिंदू बहुसंख्यकों को आज राज्य-दर-राज्य कहा जा रहा है कि गैर-हिंदू लोगों की तादाद बढ़ रही है और इस हालत में नेहरूयुगीन सहिष्णुता बेवकूफी है.
सड़क से सीमा तक हर गैर-हिंदू समूह के प्रति असीमित क्रोध का रुख ही उनके धर्म का विलोप रोक सकेगा. इस विचारधारा के लिए लगातार खाद-पानी देने को समय-समय पर सर्जिकल स्ट्राइक सरीखे सीमा पर आक्रामकता और क्रोध को सान देनेवाले मुद्दे उछाले जाते हैं, जो मीडिया की सघन पड़ताल के बाद नियमित रूप से निर्मूल साबित हो रहे हैं. सो अब मीडिया भी निशाने पर है. साक्ष्य सहित सच्चाई उजागर करने और सरकार को अक्रोध अपनाकर ठंडे दिमाग से विभिन्न कोणों से इन जटिल ऐतिहासिक मुद्दों पर विचार की सलाह देनेवाले मीडियाकर्मियों को राष्ट्रद्रोही और धर्मविमुख ही करार नहीं दिया जाता, मालिकान पर दबाव भी बनाया जाने लगा है कि ऐसे लोग तुरंत निकल दिये जाएं.
पिछले चार वर्षों में हमने बार बार देखा कि किस तरह बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक, दलित बनाम सवर्ण, दलित बनाम पिछड़े, पिछड़े बनाम अति पिछड़े, के खांचे बने.
फिर राजनीति ने इन्हें अलग-अलग सींचना शुरू किया. इससे बरसों पुरानी वे कबीलाई, जातिगत, धार्मिक हिंसा की वे बंटवाराकारी जड़ें दोबारा जिंदा होने लगी हैं, जिनको गांधीजी के खून ने जमीन के भीतर गाड़ दिया था. पिछले सत्तर बरसों की हर नयी लोकतांत्रिक शुरुआत, हर लोकतांत्रिक संस्थान पर नेहरूवादी नीतियों के विरेचन के नाम पर रंदा चलाने और मीडिया की जनहित में खुली अभिव्यक्ति के संवैधानिक हक को जिस-तिस तरह से रोक रहे नेताओं से इतना तो अब पूछना ही होगा कि वे इतने भारी बहुमत से जीतकर भी नेहरू और आजाद मीडिया के आगे इतना असुरक्षित क्यों महसूस करते हैं?
फिरकापरस्ती, आर्थिक बदहाली, धार्मिक कट्टरपंथिता और सीमा सुरक्षा से लेकर शिक्षा के बदले जा रहे स्वरूप तक कई ज्वलंत मुद्दों पर जनता के सवालों को लिये मीडिया चार साल से जवाब का इंतजार कर रहा है. पर इतने वाक्चतुर होते हुए भी खुले मीडिया सम्मेलनों से लगातार परहेज क्यों? चलिए मीडिया को परे कर दें, पर जो सवाल खुद उनके अपने लोग भी पूछ रहे हैं, उनके जवाब कहां हैं?
उनके ही वरिष्ठतम नेता मुरली मनोहर जोशी ने अपनी रपट में चौतरफा असुरक्षा भरे समय में भारतीय सेना की बढ़ती फटेहाली पर गहरी चिंता जतायी है. जम्मू-कश्मीर सुलग रहा है, तो क्या शांति के नाम पर पीडीपी से हाथ मिलाकर वहां अवसरवाद को ही नयी शक्ल दी गयी, जिससे पुरानी समस्याओं ने इतना संगीन रूप ले लिया? बारंबार यह कहने के बाद भी कि संघीय ढांचे के तहत राज्यों की स्वायत्तता का पूरा सम्मान होगा, साथी-दल टीडीपी तथा शिवसेना भी क्यों आज गठजोड़ छोड़ चुके हैं? नीतीश कुमार को अपनी तरफ लाने से क्या कोई बहुत कारगर गठजोड़ बन सका है?
जैसे यह सब नाकाफी था, अब असम में 1985 से बंद रखे गये नागरिक पहचान खाते को एकाएक खोलकर पूर्वी सीमा पर एक और भिड़ का छत्ता छेड़ दिया गया है.
यह फैसला चौधरी चरणसिंह की सफल किसान रैली से हकबकाये वीपी सिंह द्वारा दशक पुरानी मंडल रपट को बिना विचार, बिना संशोधन तुरंत लागू करने के फैसले की याद दिलाता है, जिसने देशभर में आग लगाकर उनकी सरकार गिरा दी थी.
बेशक आज दुनिया का कोई भी देश अपने नागरिकों को तकलीफ देते हुए बड़ी तादाद में प्रवासियों की भीड़ को अपने यहां नहीं न्योतना चाहेगा, पर अगर कभी सत्ता में रहे विपक्ष और सहयोगी दलों को भरोसे में लेकर उनसे इस बाबत विमर्श कर लिया जाता, तो उनके अनुभव तथा उनकी पुरानी गलतियों से सबक लेकर नागरिक पहचान के जटिल मसले पर चरणबद्ध तरीके से काम करना संभव था.
इसकी बजाय सिर्फ इकतरफा फैसला ही नहीं लिया गया, कुछ छुटभैये बड़बोले प्रतिनिधि तमाम गैर-हिंदू लोगों को ‘घुसपैठियों’ में शामिल करते हुए संशय की आग को अन्य राज्यों में भी सुलगाने लगे हैं. रही-सही कसर कश्मीर में दफा 35ए को खत्म करने की अदालती अपील निकाले दे रही है.
भारत में जब भी ऐसा होता है, तब राजनीतिक दल अक्सर दो (या अधिक) नावों की सवारी का नुस्खा अपनाते हैं, पर अनुभव गवाह है कि वह कारगर नहीं होता.
जब पंजाब में उग्रवाद चरम पर था, तब एक ध्रुव पर सौम्य लोंगोवाल बिठा दिये गये, दूसरे पर दमदमी टकसाल और भिंडरावाले. लोंगोवाल समझौते का क्या हुआ, बताने की जरूरत नहीं. यही हाल तब के असम समझौते (नागरिक रजिस्टर सहित किये गये) का भी हुआ, पर आज क्या उस समझौते के पन्ने फिर खोल देने से बात बन जायेगी?
कट्टर हिंदू समूहों की सदी पुरानी शिकायत कि कांग्रेस ने संख्या न्याय की जगह जाति न्याय को तवज्जो देकर अल्पसंख्यकों की सांप्रदायिकता को भुनाया है, निराधार है.
आज अगर हिंदू धर्मराज्य कायम हुआ, तो वह सत्तारूढ़ दल को असीमित तानाशाही की सहूलियत भले दे, नागरिकों को निजी आजादी देने के बजाय सेना, सरकार ही नहीं, स्कूलों, परिसरों, मुहल्ला कमेटियों, यहां तक कि चूल्हे-चौके तक में घुसकर आदेश देने लगेगा कि हम लोग, खासकर महिलाएं क्या करें क्या न करें, क्या खाएं-पिएं, क्या पहनें-ओढ़ें, किस तरह मंदिर जाएं आदि.
पूरे समाज को पंक्ति में ऐसा कदमताल कराने के लिए उनको संविधान से बाहर जाना होगा. तब रोज और अधिक शस्त्रास्त्रों और दमनकारी सैन्य बलों की जरूरत होगी. अंतत: एक दिन आ सकता है, जब हिंदू लोकतंत्र से हिंदुस्तान के असली शासक उतना ही डरने लगेंगे, जितना आज के मुस्लिम लोकतंत्र से पाकिस्तान के समझदार लोग.
