सामान्य तौर पर शिक्षण संस्थानों में प्राध्यापकों की संख्या अपर्याप्त रहना, विश्वविद्यालय द्वारा सत्रीय परीक्षा आयोजित कराने एवं परिणाम घोषणा में अनावश्यक विलंब करना, संस्थानों का पुस्तकालयविहीन स्थिति एवं नियमित कक्षाएं न हो पाना जैसे अनेक मुद्दे वास्तविक स्थिति को इंगित करते हैं. शिक्षण संस्थानों में प्रयोगशालाओं की स्थिति भी बहुत ही निराशाजनक रहती है. अब तो जरूरी जर्नल भी लाइब्रेरी में नहीं मंगवाये रहे हैं.
अन्य प्रदेशों की तुलना में इस प्रदेश में मेडिकल की सीटें एवं चिकित्सा संस्थानों की संख्या काफी कम है. वहीं इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है, लेकिन अधिकांश में गुणवत्तायुक्त शिक्षा के नाम पर खानापूर्ति हो रही है. परिणामस्वरूप तकनीकी छात्रों में व्यवहारिकता की कमी पायी जा रही है. इसलिए शिक्षण संस्थाओं का बन जाना ही पर्याप्त नहीं, अपितु उसे व्यावहारिकता की कसौटी पर खरा उतरना भी जरूरी है.
एमइएच अंसारी, मधुपुर, देवघर
