लगभग चालीस वर्ष पूर्व उत्तर भारत में यूकिलिप्टस यानी सफेदे के पेड़ भारी संख्या में लगाये गये थे. तब भारी वर्षा और निरंतर भयंकर बाढ़ से जमीन दलदली हो गयी थी और सड़कें व रेल पटरियां धंसने लगी थीं.
तब सफेदे के करोड़ों पौधे नदियों, नहरों, सड़को और रेल लाइनों के किनारे तथा दलदली जमीन पर लगाये गये थे. सफेदा की जड़ें बहुत गहरी होती हैं और वे पानी को जल्दी एवं ज्यादा मात्रा में सोखती हैं. इसका असर भी दिखा, मगर अब हालात विपरीत हैं. आज पानी का बड़ा संकट है और भूमिगत जल तेजी से घट रहा है.
नदियां भी सूख चुकी हैं और जलस्तर तेजी से नीचे चला गया है. एेसे में अब जल शत्रु सफेदे की जगह नीम, पीपल और बरगद आदि के पेड़ भारी संख्या में लगाने की सख्त जरूरत है. इससे बड़े स्तर पर रोजगार सृजन के साथ-साथ पर्यावरण में भी सुधार होगा. दुर्भाग्य से फिलहाल सरकार का इस ओर कोई विशेष ध्यान ही नहीं है.
वेद मामूरपुर ,नरेला
