अन्ना आंदोलन से उभरे अरविंद केजरीवाल ने एक स्वच्छ छवि के देशभक्त और भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए समर्पित कार्यकर्ता के रूप में खुद को देश के सामने पेश किया और अन्ना हजारे से दूरी के बावजूद उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री तक का राजनैतिक सफर मात्र साल-डेढ़ साल में तय कर लिया.
लोगों में आस भी जगी कि वे कुछ ठोस कर पायेंगे. पर सीएम की कुर्सी छोड़ कर उन्होंने अपनी अपरिपक्वता दिखायी और शासन से ज्यादा आंदोलन में विश्वास झलकाया जो उनके लिए नुकसानदेह साबित हुआ. उन्हें सिर्फ बुराई करने और विरोध करने में रुचि है, ऐसा उन्होंने साबित कर दिया है.
देश को ऐसे लोग नहीं चाहिए जो युवाओं को सिर्फ विरोध के लिए उकसायें और उन्हें सृजनात्मक मूल्यों से विमुख करें. लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी चारों खाने चित हुई है, इससे शायद वह सबक लें.
मनोज आजिज, जमशेदपुर
