शिक्षिका, सरकार और अखबार

II मृणाल पांडे II वरिष्ठ पत्रकार mrinal.pande@gmail.com जून के अंत में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने सहयोगियों, अफसरों और सरकारी नुमाइंदों की मौजूदगी में देहरादून में जनता दरबार लगाया. फरियादियों में 57 साल की शिक्षिका उत्तरा पंत बहुगुणा थीं, जो एक सुदूर दुर्गम इलाके से अपने बीस बरस से लंबित तबादले की […]

II मृणाल पांडे II
वरिष्ठ पत्रकार
mrinal.pande@gmail.com
जून के अंत में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने सहयोगियों, अफसरों और सरकारी नुमाइंदों की मौजूदगी में देहरादून में जनता दरबार लगाया. फरियादियों में 57 साल की शिक्षिका उत्तरा पंत बहुगुणा थीं, जो एक सुदूर दुर्गम इलाके से अपने बीस बरस से लंबित तबादले की मांग लेकर इस उम्मीद से आयी थीं कि अपनी व्यथा सुनाकर वे इस बार सरकार को द्रवित कर सकेंगी.
मुख्यमंत्री के सामने खड़ी होकर उन्होंने बाअदब बात शुरू की- सर, 25 साल से पहाड़ के दूरस्थ स्थान में तैनात हूं, पति की मौत हो चुकी है, बच्चों को अनाथ की तरह नहीं छोड़ सकती, नौकरी भी नहीं छोड़ सकती. इन दिनों अवैतनिक अवकाश पर हूं… सर आपको मेरे साथ न्याय करना ही पड़ेगा.
मुख्यमंत्री ने पूछा- नौकरी पाते वक्त क्या लिखकर दिया था? शिक्षिका का उत्तर तल्ख था- सर सारी उमर वनवास भोगूं, यह तो नहीं लिखा था… इस पर बिफर कर सीएम ने उस शिक्षिका को तुरंत सस्पेंड करने का मौखिक आदेश और दरबार से हटाने का हुक्म दे दिया. इस पर उत्तरा पंत भी काफी गुस्सा हो गयीं. तब उनको हिरासत में लेने का हुक्म हुआ, जिसका पालन किया गया.
उत्तरा पंत बहुगुणा कई दिन पहले से एक तरह के सविनय अवज्ञा आंदोलन पर थीं. वह अपने स्कूल नहीं जा रही थीं. डर था कि काम करने लगेंगी, तो उनका मामला फिर टाल दिया जायेगा. दरअसल, पहाड़ों में पत्रकार उमेश डोभाल की मौत के समय से ही शराब माफिया बहुत सक्रिय रहा है.
उत्तरा ने पुराने मुख्यमंत्री से भी फरियाद की थी कि पति अकेले रहते थे. शराब की लत पड़ गयी है. संभालने-समझाने के लिए पत्नी भी साथ नहीं रही, तो एक दिन शराब का शिकार बन जायेंगे. कैडर का हवाला देकर बात टाल दी गयी. आशंका सही साबित हुई और शराबनोशी से उनके पति की मौत हो गयी.
उसके बाद अब बच्चों को सहेजने-संभालने की चुनौती भी है, जिसके चलते वे देहरादून में तबादला चाहती हैं. ऐसे मामलों में कई बार मानवीय आधार पर तबादले किये या रद्द कराये जाते रहे हैं. खुद मुख्यमंत्री जी की पत्नी शिक्षिका हैं और 1996 से देहरादून में अपने पति के साथ हैं.
यह दुखद कहानी देश की ग्रामीण स्कूली शिक्षा व्यवस्था को लेकर कुछ सवाल खड़े करती है.
भारत में शिक्षा विभाग सबसे ज्यादा नौकरियां देनेवाला विभाग है. ग्रामीण इलाकों में लगातार प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा संस्थाएं खुलने से हर स्कूल के लिए इमारत या फर्नीचर से भी अधिक दरकार अध्यापकों की होती है.
पर जरूरी होने के बावजूद इन अध्यापकों का स्थान शिक्षा विभाग में सबसे नीचे है. खासकर एक महिला का, जो किसी रसूखदार परिवार से नहीं और अकेली सुदूर इलाके में पोस्ट कर दी गयी है. खुद अध्यापक न होते हुए भी बड़े अफसरान इन अध्यापकों का भविष्य व पदोन्नति तय करते हैं और स्वयं राजधानी में विराजते हैं. स्कूलों के नियमित मुआयनों की पुरानी गरिमामय सख्ती कहीं नहीं दिखती.
आजादी के बाद समय-समय पर शिक्षा का ढांचा तय करने का दायित्व शीर्षस्तरीय सरकारी समितियों का है, जिनकी सलाहों का अनुपालन नौकरशाही करती है. इस तरह शिक्षा लगातार पूरी तरह से कार्यालयीन विषय बना दी गयी है.
और अध्यापक लोग स्थानीय निकायों के चुने हुए प्रतिनिधियों की बजाय राज्य की राजधानी में बैठे सचिवालयीन विभागीय अधिकारियों पर निर्भर बन गये हैं. वे उत्तरा सरीखी टीचरों का तबादला इस या उस कैडर का हवाला देकर तब तक टालते चले जाते हैं, जब तक कि वे थक कर खामोश न हो जाएं.
दूसरा मसला शराब का है. देवभूमि के गला-फाड़ प्रचार या शराब पर लगाम लगाने की बातें बहुत की जाती हैं, पर सच यह है कि देश में हर कहीं सड़कें न हों तब भी राशन भले नियमित रूप से न पहुंचे, पर शराब के पाउच पहुंच जाते हैं.
उत्तराखंड सरीखे राज्यों में शराब माफिया का कैसा रसूख है, किस तरह होटलों से लेकर मंदिरों तक के रखरखाव में शराब विक्रेताओं की भागीदारी रहती है, नेता से बड़े अफसर तक सब उनकी मुट्ठी में रहते हैं, किस तरह बिल्डर माफिया शामलाल की जमीन पर बेधड़क कब्जा कर लेते हैं, ये बातें तो मशहूर शराब व्यापारी पौंटी चड्ढा हत्याकांड के बाद लगातार सुर्खियां बनती रही थीं.
ऐसे माहौल में अगर किसी शिक्षिका के परिवार को बीसियों बरस तक तितर-बितर कर दिया जाये, तो कोई भी भली महिला बुरी तरह टूट जायेगी. जनता दरबार में उसी टूटन का जिक्र करना उत्तरा जैसियों को बहुत भारी पड़ता है, यह हम सबने टीवी पर उनके साथ हुए सलूक की फुटेज में साफ देख लिया.
तीसरा मसला लोकल मीडिया बिरादरी से सीधा जुड़ता है. उपरोक्त जानकारी रखते हुए भी, पीड़िता को जनता दरबार में खुलकर बात कहने पर नियमावली और अनुशासन के हवाले देकर इस तरह जलील किये जाने पर लोकल-मेनस्ट्रीम मीडिया के क्षेत्रीय संस्करणों ने कोई सार्थक भूमिका नहीं निभायी. अलबत्ता सोशल मीडिया इस पूरे प्रकरण को लेकर मुख्यमंत्री से सवाल करने के साथ व्यापक गुस्से का इजहार दिखाता रहा.
क्या सरकार वाकई पारदर्शी है? क्या ऐसे आदमी के रहते उत्तराखंड में मोदी मैजिक आगे चल सकेगा? समाजसेवी संस्थाओं की मदद से एक जांच में सामने आया कि एक मंत्री की शिक्षिका पत्नी तो बांड भरकर भी तीन बरस से पिथौरागढ़ स्थित राजकीय इंटर स्कूल जाये बिना ही वेतन पाती रही हैं.
लेकिन देहरादून के तीन प्रमुख हिंदी अखबारों में खबरों की शुरुआत ही महिला शिक्षिका पर अशोभनीय व्यवहार के आरोप से की गयी. यह चुस्त मीडिया प्रबंधन का उदाहरण है कि अचानक एक ह्वाॅट्सएप ग्रुप प्रकट हो गया है, जिसमें सरकार के मीडिया प्रबंधकों ने उत्तरा जी को दोषी ठहरानेवाली विज्ञप्ति से शुरुआत की है.
दूर के इलाकों में बरसों परिवार से अलग रहने को बाध्य शिक्षकों का शोषण रुक नहीं रहा, क्योंकि हर तरह के जातीय, क्षेत्रीय हितों ने अध्यापक संगठनों को हिला दिया है.
उनके बीच भेदभाव का लाभ नेता और नौकरशाह उठाते हैं, जिनके चुनाव प्रचार से लेकर घरेलू शादी-ब्याह तक में सेहरा लिखने या घड़े पेंट करने तक का दायित्व शिक्षक उठाते हैं. उन्हें उम्मीद है कि उनकी पोस्टिंग-तबादला सही समय पर सही जगह ही किया जायेगा.
अब हमको शिक्षा के राजनीतिक और सामाजिक संदर्भों को समझना-पकड़ना ही होगा. इसकी शुरुआत उत्तरा बहुगुणा के मामले से की जा सकती है, जो शिक्षा तंत्र और उसे बुनियादी रूप से चला रहे लोगों की लगातार बढ़ती बदहाली का नमूना है.

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