।। रूपम कुमारी।।
(प्रभात खबर, रांची)
हमारे देश में मुफ्त चीजों की चाह सभी को है. इसलिए दुकानों में सेल लगने से लोग बिना नहाये-धोये घर से निकल पड़ते हैं, ताकि कोई और अधिक लाभ ना उठा ले. गरीब तो गरीब, अमीरों में भी मुफ्त पाने की लालसा बड़े जोरों की है. अगर कहीं मुफ्त खाने की चीजें बंट रही हों, तो उस पर टूटने वाले सभी वर्ग के लोग आपको वहां मिल जायेंगे. कहीं भजन हो रहा है, तो श्रद्धा पूर्वक जानेवाले लोग कम ही मिलेंगे पर लंगर की व्यवस्था होने की खबर मिले, तो उसी स्थान पर भारी भीड़ इकट्ठी मिल जायेगी.
पूछने पर सुनने को मिलता है, भाई भगवान का प्रसाद है, ना कैसे बोल सकते हैं. वे इस कदर वहां भोजन पर टूट पड़ते हैं, मानो कितने दिनों तक घर में खाना ही न मिला हो. चुनाव में अगर नेता चुनने की बात सामने आती है, तो लोगों में वही नेता लोकप्रिय होता है, जो चुनाव के समय मुफ्त वस्तुएं देने की घोषणा करता है. यहां तक मतदान केंद्र तक जाने के कष्ट को कुछ लोग मुफ्त की क्रिया समझते हैं. पानी मुफ्त मिलता है, ले लो. लैपटॉप मिलता है तो भी बुरा नहीं है, भले ही काम न आये तो क्या हुआ बेच कर पैसे तो मिलेंगे न!
कहीं किसी जगह राशनकार्ड बनवाने, बिजली या पानी का बिल जमा करने, रेलवे स्टेशन पर टिकट खरीदने अथवा कहीं किसी सुविधा के लिए आवेदन जमा करना हो, वहां कतारबद्ध खड़े होने पर कई लोगों को परेशानी होती है. कुछ लोग लाइन में खड़ा होना शर्म की बात समझते हैं, तो कुछ बीच में घुस जाना अपनी शान या फिर कहें अपना मौलिक अधिकार समझते हैं. भले ही पीछे खड़े लोग कितनी भी प्रतिक्रिया दें, ठेलमठेली करें, वे टस से मस नहीं होते. मौके का फायदा उठाते हुए कई समझदार लोग कतार के रेलमपेल से बचने के लिए महिलाओं को अपना प्रतिनिधि बनाने में जरा सी भी चूक नहीं करते.
अगर आप सैर-सपाटे में रुचि रखते हैं, तो कई पर्यटन स्थल या फिर पार्को में आप लोगों को प्लास्टिक की बोतल या फिर अन्य सामान फेंकते हुए देखेंगे, जो कि हमारे देश में आम बात है. ऐसी जगहों पर वे सोचते हैं कि पर्यटन स्थल उनके लिए मुफ्त है. वहां के कचरे या तो खुद ही स्वचालित हो कर हवा में उड़ जायेंगे या फिर जो यहां से कमाता है वही इसकी जिम्मेदारी लेगा, हम टेंशन क्यों लें? हमने तो बाकायदा टिकट शुल्क देकर प्रवेश किया है, तो इतनी सी गंदगी फैलाने का अपना हक तो बनता ही है.
मुङो लगता है कि लोगों में जो सरकारी चीजों को अपना समझने की फितरत है, वही हमारे देश को कहीं न कहीं डूबो रही है. सड़क पर चल रहे हो, तो पूरा सड़क छेक कर चलो, सरकारी दफ्तरों में जहां-तहां थूकने का पूरा अधिकार है, आखिर हम टैक्स जो भरते हैं. कभी-कभार तो हम लोगों की यही आदत मंदिरों में भी नहीं छूटती, वहां भी हम अव्यवस्था फैला कर अपनी सिविक सेंस की छाप छोड़ जाते हैं.
