गणतंत्र दिवस हो या स्वतंत्रता दिवस, राष्ट्रीय पर्व हमें नव ऊर्जा संचित कर राष्ट्र-कल्याण की प्रेरणा देते हैं. दिल्ली और देश के प्रांतो की राजधानियों में तिरंगा फहराकर भव्य समारोह आयोजित कर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते है, यह उचित नहीं है. आज गणतंत्र दिवस है.
इसे राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मनाते है. महात्मा गांधी और तत्कालीन गणमान्य राष्ट्र नेताओं के विचारों के आशादीप उन्हीं के साथ बुझ गये हैं. स्वराज्य तो आया, मगर सुराज नहीं आया. गांधीजी के रामराज का सपना उनकी मृत्यु के साथ ही नष्ट हो गया. हम उजाले के लिए निकले और अंधेरा ले आये, तो यह दोष किसका है? जोश में हम होश भूल गये. यह अवसर है एक बार फिर से उस सपने को साकार करने का प्रयास शुरू करें. और एक खुशहाल राष्ट्र के रूप में भारत को विश्व पटल पर पहचान दिलायें.
कांतिलाल मांदोत, इमेल से
