24 अप्रैल 2014 को आजाद हिंदुस्तान विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के महापर्व के रंग में पूरी तरह रंगा हुआ था. झारखंड में भी लोकतंत्र का महापर्व पूरे उफान पर था. पूरा प्रदेश महापर्व का जश्न मना रहा था. बूथों पर समय से पहले ही मतदाताओं की कतार लग गयी थी. जैसे-जैसे सूर्य की किरणों चढ़ती गयीं, वैसे-वैसे मतदान का प्रतिशत भी बढ़ता गया.
लेकिन अफसोस कि इस शुभ बेला में सरकारी महकमे की लापरवाही में आठ लोगों की जानें चली गयीं. दुमका जिले के शिकारीपाड़ा थाना क्षेत्र में असना से चुनाव करा कर लौट रही पोलिंग पार्टी की बस को नक्सलियों ने लैंड माइन विस्फोट कर उड़ा दिया. झारखंड में इससे पहले लोकसभा चुनाव के दो चरण शांतिपूर्ण संपन्न हुए थे, पर अंतिम चरण में पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था ताक पर रह गयी और नक्सलियों ने बेखौफ होकर घटना को अंजाम दिया.
इसके साथ ही झारखंड में नक्सलियों ने अपने नापाक इरादों को अंजाम देकर एक बार फिर यह साबित कर दिया कि वे अब भी सक्रिय हैं और कभी भी किसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकते हैं. सुरक्षा के लिहाज से कुछ खास इंतजाम नहीं किया गया और इसी चूक का एक बार फिर नक्सलियों ने फायदा उठाया. सुरक्षा व्यवस्था का आलम यह था कि घटनास्थल पर जवानों को आकर उल्टे पांव भागना पड़ा. पर इन सबके बीच शर्म आती है ओछी राजनीति पर. शहीदों के खून के धब्बे अभी सूखे भी नहीं थे कि लाशों की गिनती की राजनीति शुरू हो गयी.
सवाल यह है कि बार-बार हम ये हमले कब तक सहेंगे? काफी दिनों से खोखली बातें चल रही है कि नक्सलियों से लड़ने के लिए नयी रणनीति तैयार की जाएगी, सेना की मदद ली जायेगी, वगैरह. आखिर यह सब किया कब जायेगा?
नवनीत कुमार सिंह, रांची
