हिंदी के कवि धूमिल ने कहा था कि ‘दरअसल हमारे यहां संसद तेली की वह घानी है/ जिसमें आधा तेल और आधा पानी है.’ तो क्या इसी वजह से हमारे देश के किसानों ने अलग से अपना ‘किसान मुक्ति संसद’ का आह्वान किया? हम सवाल के साथ ही बात शुरू करते हैं.
देशभर के किसानों ने 20 नवंबर को किसान मुक्ति संसद का आह्वान किया और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एकत्रित हुए. समूचे देश के 180 किसान संगठन ‘अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति’ के बैनर तले रामलीला मैदान से संसद मार्ग पहुंचे. संभवतया अब तक सबसे बड़ा किसान समन्वय समिति आज के वैश्विक समय की जरूरत है.
पी साईनाथ की रिपोर्ट के अनुसार, नब्बे के बाद डेढ़ दशकों में लाखों किसानों ने आत्महत्या की है. आत्महत्या का यह सिलसिला रुक नहीं रहा है. कई राज्यों में कर्ज माफी के बावजूद किसानों की आत्महत्या में कमी नहीं हुई है. साल 2016 के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, देश में किसान आत्महत्या की दर 42 फीसदी बढ़ी है. इसके बावजूद किसानों की समस्यायों के प्रति उदासीनता बनी हुई है. किसान संगठनों ने इसी उदासीनता के विरुद्ध ‘किसान मुक्ति संसद’ का आह्वान किया है.
किसान संसद कर्ज माफी और समर्थन मूल्य की मांग को प्रमुखता से रख रहे हैं. इसमें स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों को लागू करने की बात है. सरकार का मानना है कि वह समय-समय पर किसानों को कर्ज में छूट देती है और फसलों के लिए समर्थन मूल्य भी तय करती है. इन दोनों मुद्दों पर 2004 में बनी स्वामीनाथन कमेटी ने सिफारिश की थी कि किसानों के कर्ज की ब्याज दरों में कटौती की जाये और समर्थन मूल्य औसत लागत से 50 फीसदी ज्यादा हो. लेकिन, इन दोनों मुद्दों पर सरकार की ओर से कोई बुनियादी क्रियान्वयन न होने से किसानों में असंतोष है. आज खेती के काम का लागत मूल्य बढ़ गया है. खेती के लिए बीज, तकनीक और उर्वरक किसानों के हाथ में नहीं हैं. ये सभी किसानी की बुनियादी वस्तुएं बाजार के नियंत्रण में हैं. किसानों को खेती के लिए बाजार में पहुंचना ही होता है. बाजार में पहुंचने से पहले किसान कर्ज के लिए किसी संस्था में पहुंचता है. तब जाकर वह अपने खेत में फसल डालता है. इसके बाद दो स्थिति पैदा होती है- पहला मौसम, और दूसरा बाजार मूल्य. मौसम की मार किसानों को झेलनी पड़ती है.
इसके अलावा किसानों के लिए सबसे विकट स्थिति तब होती है, जब उसे उसकी उपज का मूल्य नहीं मिलता है. यह सबसे ज्यादा निराशाजनक होता है. सवाल यही है कि किसानों की उपज का मूल्य बाजार में कौन तय करता है? सरकार या बिचौलिये? क्योंकि किसानों को उपज का वास्तविक मूल्य नहीं मिलता है, जबकि किसानों की उपज पर आधारित उद्योग दिन दूनी फलते-फूलते जाते हैं. उदाहरण के लिए, आलू के मूल्य में गिरावट हो जाती है, लेकिन आलू आधारित उत्पाद तैयार करनेवाली ‘चिप्स’ कंपनियां हमेशा मुनाफे में होती हैं. आलू उपजानेवाले किसान आत्महत्या को विवश होते हैं, जबकि चिप्स कंपनियां मुनाफे में होती हैं. यानी इन दोनों के बीच में बाजार है और वह किसानों के नियंत्रण में नहीं है. ऐसी स्थिति में यदि सरकार पहल नहीं करेगी, तो आखिर कौन करेगा?
आम तौर पर जिनका किसानी से वास्ता नहीं है, उनका मानना होता है कि खेती-किसानी जैसे क्षेत्र में भी अंतरराष्ट्रीय दबाव कैसे नीतिगत रूप से काम कर सकता है? यह बहुत बड़ी सच्चाई है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव आज के किसानों के जीवन में सीधे हस्तक्षेप करता है. एक तो सरकारों को फंडिंग करनेवाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां ‘सब्सिडी’ न देने का निर्देश देती हैं. दूसरे, अब खेती की दुनिया में भी बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का सीधा हस्तक्षेप है. इसके उदाहरण के लिए कपास की खेती को लिया जा सकता है. शासन में आते ही केंद्र की एनडीए सरकार ने कपास के जीएम बीज (जैव संवर्धित) के मूल्य को कम करने की घोषणा की थी. देश में कपास की लगभग 90 फीसदी बुआई मानसेंटों के बीज की होती है. दुनिया की सबसे बड़ी बीज उत्पादक अमेरिकी कंपनी मानसेंटों ने इस पर सीधे आपत्ति दर्ज की और भारत से अपने व्यापार को समेटने की चेतावनी दे दी थी, और उस समय कपास के बीज का मूल्य कम नहीं हो सका. इस पर फिर कभी बात नहीं हुई. बीज से लेकर बड़ी तकनीकों, कीटनाशकों, आदि खेती संबंधी उपकरणों पर बड़ी कंपनियों का नियंत्रण है. यह कितनी बड़ी विडंबना की बात है कि खेती के तकनीकों, रसायनों और उसके उत्पादों से जुड़ी कंपनियां अरबों का व्यवसाय करती हैं, लेकिन किसान आत्महत्या करने को विवश होते हैं.
इसके अलावा किसानों के बीच जोत की आंतरिक समस्या भी है. एक तो देश में चकबंदी की योजना सफल नहीं हुई. दूसरे, किसानों के जोत लगातार बंटते जा रहे हैं. इस वजह से खेती में जटिलता पैदा हो रही है. इससे लागत मूल्य और पैदावार पर असर पड़ रहा है.
आदिवासी किसानों के साथ एक दूसरी स्थिति है. आदिवासी लोग अपनी जमीन पर स्थिर नहीं हैं. वे विस्थापन के शिकार हैं. ऐसे में उनकी खेती कैसे संभव होगी? आदिवासी किसानों के साथ तो सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कथित मुख्यधारा का बहुत बड़ा हिस्सा बौद्धिक और वैचारिक रूप से भी उन्हें ‘किसान’ नहीं मानता है. उन्हें अब भी यह लगता है कि आदिवासी जंगलों में रहते हैं और जंगल के उत्पाद पर ही उनकी आजीविका है. इस वजह से उनकी खेती की बात बहुत कम होती है. जबकि, कृषि उनकी आजीविका का अनिवार्य हिस्सा है. किसान मुक्ति संसद ने आदिवासी किसानों के पक्ष को भी शामिल कर संघर्ष को विस्तार देने की कोशिश की है.
आज की वैश्विक दुनिया ‘लोहा’ बनाम ‘गेहूं’ की दुनिया बन गयी है. सरकारों के लिए ‘लोहे’ की खेती ज्यादा फायदेमंद है और वे उसमें व्यस्त हैं. ऐसे में किसानों की परवाह किसे होगी? अंततः किसानों को अपना ‘संसद’ तय करना होगा. धूमिल की शब्दावली में ‘आधा तेल’ और ‘आधा पानी’ से किसानों के हित संभव नहीं हैं. किसान मुक्ति संसद को कर्ज माफी और समर्थन मूल्य से आगे बढ़कर पूंजीवाद से मुक्त होने की लड़ाई लड़नी होगी.
डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
anujlugun@cub.ac.in
