पिछले दिनों दिल्ली में छाये स्मॉग को लेकर सोशल मिडिया पर एक व्यंग्य मैसेज वायरल हुआ- पत्नी को लेने दिल्ली गया पति कोहरे के कारण पड़ोसन को ले आया. इसे कई अखबारों ने कार्टून के साथ छापा.
यह खबर फैलनी ही थी, क्योंकि मानव मन कल्पनाओं में जीने का आदी है. खबर झूठी हो या सच्ची, पर ऐसे किस्मत वाले पति की चाह कौन न चाहेगा. कइयों को इस खबर से उम्मीद की किरण नजर आती होगी. हो सकता है लोग अपने-अपने ससुराल के मौसम की पड़ताल कर रहे होंगे कि किस महीने में उनके ससुराल में घना कोहरा रहता है. पर, इतने भले लोग बचे ही नहीं, जो भाग्य बदलने का अवसर बता दें. इसलिए खुद ही गूगल कीजिये और ससुराल के मौसम का हाल पता कीजिये. चाहे तो पत्नी से भी पूछकर ट्राई कर लीजिये. यदि वह भोली-भाली होगी, तो चारों मौसम के हाल बता देगी, नहीं तो मौसम के मिजाज ऐसे बिगाड़ेगी कि फिर जीवनभर मौसम देखकर मायूस होते रहेंगे.
वायरल मैसेज के तहलके से दिल्लीधारी पतियों के प्रति आम पतियों में ईर्ष्या पनपने की खबर भी आयी. जब अकबर राजधानी को सीकरी से दिल्ली लाया था, तभी से अमूमन दिल्ली के प्रति रोष का भाव बना हुआ है. वजह कुछ भी हो, लेकिन गम गलत करने के लिए दिल्ली ही निशाने पर रहती आयी है. पहली बार पुराने हो चुके पतियों में दिल्ली के प्रति लगाव उत्पन्न होने लगा है. दिल्ली से जुड़ी चीजों में बेवजह कई अच्छाइयां नजर आने लगी हैं. नत्थूलाल जी की मूंछों की तरह जुमला चल निकला है- ससुराल हो तो दिल्ली में हो, वरना न हो!
लोग ऊपर वाले से दुआ करने में जुटे हैं कि उनके ससुराल में भी कोहरे की मेहरबानी अता हो मौला. वहीं दिल्ली में पड़ोसियों के संगठन ने मोर्चा निकालकर छानेवाले कोहरे का विरोध करने की ठानी है. उन्होंने सरकार से मांग रखी है कि कोहरे के वक्त ससुराल से पत्नी लेने आने पर दामाद को प्रतिबंधित किया जाये. अन्यत्र दूसरे शहरों में भी कई दामाद आ-आकर ससुराल वाले शहरों में डीजल वाहन वृद्धि की तिकड़में भिड़ा रहे हैं. ससुराल के विकास के लिए हर बस्ती-कालोनी में नये-नये भवन निर्माण की तकरीर देकर चाहते हैं कि दस गुना ईंट-भट्टे स्थापित किये जायें. सरकार इस वस्तुस्थिति की गंभीरता को भांप गयी और दामादों की आनन-फानन में दिल्ली दामाद बनाने का वैकल्पिक प्रस्ताव के प्रावधान पर विचार करने को सहमति जुटाने में लगी है. सरकार को शक है कि जल्द उपाय नहीं खोजा गया, तो दामादों द्वारा देशव्यापी खुराफात शुरू हो सकती है.
देखा जाये, तो तीर्थ और ससुराल में बहुत समानता होती है. दोनों ही जगह पहले प्रवेश के साथ परिवर्तन प्रारंभ होने लगते हैं. इसलिए ससुराल को तीर्थ की संज्ञा पर दामाद के साथ बेटी भी खुशी से भर जाये, इसके लिए आदेश हो सकता है कि ससुराल को गेंदा फूल नहीं, गेंदा तीर्थ बोला जाये!
मनोज श्रीवास्तव
व्यंग्यकार
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