भारतीय रेल को अपने देश का ‘राष्ट्रीय परिवहन’ कहा जाता है. हर आम और खास के लिए यात्रा का यही सबसे सस्ता और सुविधाजनक जरिया है. लेकिन रेलगाड़ियों में सुरक्षा का जो हाल है, उसे देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि रेल यात्रा में माल के साथ-साथ जान का भी जोखिम है. रेलवे सुरक्षा में सबसे खराब ट्रैक रिकॉर्ड हिंदी पट्टी के राज्यों का है जिसमें झारखंड का भी बड़ा ‘योगदान’ है.
राज्य में ऐसे कई रेल मार्ग हैं जो जंगलों और सुनसान इलाकों से गुजरते हैं. ऐसे मार्गो पर रात में रेलगाड़ियों में लूटपाट आम हो गयी है. सबसे ज्यादा वारदातें बरकाकाना से गढ़वा के बीच हो रही हैं. बीते रविवार की रात को भी इसी मार्ग पर मैक्लुस्कीगंज और महुआमिलान स्टेशनों के बीच मुगलसराय-बरकाकाना पैसेंजर में हथियारबंद बदमाशों ने बड़े पैमाने पर लूटपाट की. कई यात्रा ियों पर हमला कर उन्हें जख्मी कर दिया. पांच को तो अस्पताल में भरती कराना पड़ा.
महिलाओं से बदसलूकी भी की गयी. हर कुछ दिन बाद इसी तरह का समाचार पढ़ने को मिल जाता है. जिस रेल मार्ग पर यह वारदात हुई, उसके आसपास का इलाका उग्रवाद प्रभावित है. इन इलाकों में रात्रिकालीन गश्त न के बराबर है. आम जनजीवन भी रात में ठहरा सा रहता है. यह माहौल अपराधियों को फायदा पहुंचाता है. वे जानते हैं कि उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है. इस मार्ग से गुजरनेवाली रेलगाड़ियों में पुलिस दस्ते की तैनाती की व्यवस्था है.
लेकिन, ये दस्ते सिर्फ खास-खास रेलगाड़ियों में ही तैनात रहते हैं. पैसेंजर और छोटी दूरी की एक्सप्रेस गाड़ियां रामभरोसे चल रही हैं. इसके अलावा, जो दस्ते तैनात रहते हैं, वे भी उग्रवादी हमले की आशंका के चलते मुसाफिरों से ज्यादा अपनी और अपने हथियारों की हिफाजत को लेकर परेशान रहते हैं. रेलगाड़ियों की पांच-पांच, दस-दस बोगियों में लूट हो जाती है, और पुलिस मौका-ए-वारदात पर नहीं पहुंच पाती. रेलगाड़ियों की सुरक्षा केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों की जिम्मेदारी है. लेकिन हकीकत यह है कि कोई इस जिम्मेदारी को लेने को तैयार नहीं दिखता. हालात ऐसे बन रहे हैं कि ‘अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें’ की तर्ज पर अब यह भी कहा जायेगा कि ‘अपनी जान की हिफाजत खुद करें’.
