अक्सर सफर करने के दौरान रास्तों के किनारे ‘दुर्घटना से देर भली’ जैसे वाक्य देखने को मिल जाते हैं. पढ़ कर सुरक्षित यात्रा के लिए देरी होने को भी जायज मानने की सीख मिलती है. लेकिन इसी देरी को न्यायपालिका के संदर्भ में देखने से भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है, जहां फांसी की सजा पाये अभियुक्त इसी देरी की वजह से बच जाते हैं, तब यह देरी हमें बेकार मालूम पड़ती है और लगता है कि किसी भी काम में हुई देरी कितनी भारी पड़ सकती है.
सर्वोच्च न्यायालय ने राजीव गांधी हत्याकांड के तीन आरोपियों के मृत्यदंड को दया याचिका के निबटारे में हुई देरी के कारण आजीवन कारावास में बदल कर एक नयी परिपाटी शुरू कर दी है. इसी क्र म को आगे बढ़ाते हुए खालिस्तान समर्थक आतंकी देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर को भी देरी का लाभ मिला. क्या इसे अपराधियों के हौसले बुलंद नहीं होंगे?
आशुतोष कु सिंह, सिंदूर, हजारीबाग
