मुरली के मरने की चिंता किसे है!

।। पंकज चतुर्वेदी।। (स्वतंत्र टिप्पणीकार) महाराज छत्रसाल की आखिरी यादों के लिए मशहूर मध्य प्रदेश के धुबेला से सटे मउसहानियां में 35 साल के किसान मुरली कुशवाहा ने पहले अपनी फसल को खलिहान में जोड़ा, बगल के तालाब में स्नान किया, फिर फसल में आग लगायी और खुद उसमें कूद गया. यह दर्दनाक हादसा लोकसभा […]

।। पंकज चतुर्वेदी।।

(स्वतंत्र टिप्पणीकार)

महाराज छत्रसाल की आखिरी यादों के लिए मशहूर मध्य प्रदेश के धुबेला से सटे मउसहानियां में 35 साल के किसान मुरली कुशवाहा ने पहले अपनी फसल को खलिहान में जोड़ा, बगल के तालाब में स्नान किया, फिर फसल में आग लगायी और खुद उसमें कूद गया. यह दर्दनाक हादसा लोकसभा चुनाव के मतदान की पूर्व संध्या पर हुआ. चार एकड़ खेत जोत कर अपने परिवार के सपने पूरे करने की कोशिश करनेवाला मुरली बीते दो महीनों में आयी प्राकृतिक आपदाओं से फसल को हुए नुकसान से हताश था. उसे आनेवाले महीनों के व्यय, सिर पर चढ़े बीज-खाद के उधार की चिंता थी. इतनी मार्मिक खबर चुनावों के शोर में कहीं दब गयी. बेहतर मानसून और अच्छी बुवाई के कारण उसके श्रम से उपजे अनाज के दाने खेतों में सोने की तरह दमक रहे थे. पर पूरे मार्च पानी बरसा और पहले सप्ताह में तो जम कर ओले पड़े. अप्रैल में जब दाने निकलने की बारी आयी, तो फिर आंधी-बारिश शुरू हो गयी. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, यूपी, राजस्थान सहित पूरे मध्य भारत में किसानों पर दुखों का पहाड़ टूटा. उन्हें संकट दिखने लगा कि घर का खर्च, बैंक का कजर्, अगली फसल की तैयारी आदि कैसे होगी?

किसान के साथ तो यह होता ही रहता है-कभी बाढ़ तो कभी सुखाड़, कभी बीज-खाद-दवा नकली, तो कभी फसल अच्छी आ गयी, तो मंडी में अंधाधुंध आवक के चलते माकूल दाम नहीं. प्राकृतिक आपदाएं किसान के लिए मौत से बदतर होती हैं. किसानी महंगी होती जा रही है और कर्ज से उस पर दबाव बढ़ रहा है. सरकार किसानों को कर्ज देकर सोचती है कि इससे खेती की दशा बदल जायेगी, जबकि किसान चाहता है कि उसे उसकी फसल की कीमत की गारंटी मिले. देश की जीडीपी का 31.8 प्रतिशत खेती में लगे कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है. विडंबना है कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सुधारों को नजरअंदाज किया जाता रहा है. बीमा की कई लुभावनी योजनाएं सरकारी दस्तावेजों में मिल जायेंगी, लेकिन अनपढ़, सुदूर क्षेत्रों के किसान इनसे अनभिज्ञ हैं. दरअसल, योजनाओं के लिए इतने कागज-पत्तर भरने होते हैं कि किसान उनसे मुंह मोड़ लेता है.

एक तरफ पूरी तरह सिंचित खेती तो दूसरी ओर बारिश पर निर्भर किसान. एक तरफ बढ़िया फसल लहलहाती है, तो दूसरी तरफ बाढ़ या सूखे से किसान रोता दिखता है. ऐसे में उत्पादन के स्तर में अनिश्चितता तथा मूल्यों के उतार-चढ़ाव की स्थिति से निबटने की क्षमता किसानों में कम हो गयी है. साथ ही कर्ज की वापसी और वित्तीय संस्थाओं द्वारा कृषि में निवेश भी बहुत कम रहा है. इसी दर्द के चलते बीते वर्षो में हजारों किसानों की खुदकुशी की घटनाएं देश में बहस का मुख्य मुद्दा रही हैं. इसके बावजूद खेती-किसानी के बीमा के मामले में सरकार का नजरिया सदैव लापरवाही वाला रहा है. 1947 में डॉ राजेंद्र प्रसाद द्वारा पेश किये गये केंद्रीय विधान में फसल बीमा पर राष्ट्रव्यापी बहस की जरूरत का उल्लेख किया गया था. वैसे भी फसल बीमा किसानों के लिए जरूरी नहीं है, क्योंकि हमारे देश के किसानों में जागरूकता का अभाव है. इसलिए दूरस्थ गांवों तक किसानों को इसका लाभ मिलना संदिग्ध ही रहा है .

किसान को न तो कर्ज चाहिए और न ही बगैर मेहनत के कोई छूट या सब्सिडी. बेहतर होगा, यदि उसके उत्पाद को उसके गांव में ही विपणन और सुरक्षित भंडारण की स्थानीय व्यवस्था की जाये. उसे खाद-बीज-दवा के असली होने की गारंटी मिले. हर किसान के रकबे में बोई गयी फसल, उससे संभावित फसल का आंकड़ा सरकार के पास हो तथा किसी दुखद परिस्थिति में किसान को मुआवजा उसी के अनुसार सीधे उसके बैंक खाते में जमा करने का नेटवर्क बनाया जाये. ज्यादा फसल के हालात में किसान को बिचौलियों से बचा कर सरकारी एजेंसियां खुद गांव-गांव जाकर खरीदें. कुल मिला कर किसान के उत्पाद के विपणन या कीमतों को बाजार नहीं, बल्कि सरकार तय करे.

किसान भारत का स्वाभिमान है और देश के सामाजिक व आर्थिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण जोड़ भी, इसके बावजूद उसका शोषण हो रहा है. किसान को उसके उत्पाद का सही मूल्य मिले, उसे भंडारण, विपणन की माकूल सुविधा मिले, खेती का खर्च कम हो और इस व्यवसाय में पूंजीपतियों के प्रवेश पर प्रतिबंध आदि जैसे कदम देश का पेट भरनेवाले किसानों का पेट भर सकते हैं. चीन में कृषि विकास की सालाना दर 7 से 9 प्रतिशत है, जबकि भारत में यह गत 20 सालों से 2 प्रतिशत को पार नहीं कर पायी है. अब तो विकास के नाम पर खेत उजाड़ने के खिलाफ पूरे देश में हिंसक आंदोलन भी हो रहे हैं. विडंबना है कि हमारे आर्थिक आधार की मजबूत कड़ी के प्रति न तो समाज और न ही सियासी दल संवेदनशील दिख रहे हैं. काश! इस चुनावी समर में कोई किसान को मुनाफे का सच्च भरोसा दे पाता, तो मुरली को जान न देनी पड़ती.

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