भय पर खड़ी वोट की फसल

।। अनंत विजय।। (डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर, आइबीएन 7) इस लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा के पक्ष में हवा के रुख को भांपते हुए विरोधियों के हमले तीखे हो रहे हैं. संगीन इल्जाम लग रहे हैं कि मोदी के आते ही देश में फासीवाद आ जायेगा, तानाशाही प्रवृत्ति का बोलबाला हो जायेगा, सांप्रदायिक ताकतें […]

।। अनंत विजय।।

(डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर, आइबीएन 7)

इस लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा के पक्ष में हवा के रुख को भांपते हुए विरोधियों के हमले तीखे हो रहे हैं. संगीन इल्जाम लग रहे हैं कि मोदी के आते ही देश में फासीवाद आ जायेगा, तानाशाही प्रवृत्ति का बोलबाला हो जायेगा, सांप्रदायिक ताकतें मजबूत होंगी. मोदी के विरोधी उत्साह में भले ही मोदी की तुलना हिटलर से कर दें, लेकिन वे तथ्यात्मक और सैद्धांतिक रूप में वे गलत हैं. आज के भारत की तुलना हिटलर के उत्थान के समय के जर्मनी से नहीं की जा सकती है. आज जब पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर संकट है ऐसे में भी भारत लगभग पांच फीसदी के ग्रोथ रेट के साथ मजबूती से अपनी अर्थव्यवस्था को संभाले हुए है. जनता की वर्तमान सरकार से नाराजगी है, लेकिन यह साफ है कि कोई भी अगर उसके नागरिक अधिकारों के हनन की कोशिश करेगा, तो उसे वह बर्दाश्त नहीं करेगी.

अब मीडिया पहले से ज्यादा ताकतवर है और जनता अपने अधिकारों को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक. दरअसल हमारे देश में फासीवाद एक ऐसा जुमला है, जिसका डर सदियों से दिखा कर राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही है. इसे सबसे ज्यादा इस देश में कार्ल मार्क्‍स के अनुयायी उछालते रहे हैं. ध्यान रहे कि कार्ल मार्क्‍स हमेशा से चुनाव, चुनाव करने की स्वतंत्रता और चुनी हुई संस्थाओं का विरोध करते थे. उनका मानना था कि जब तक आर्थिक समानता नहीं हो, तो चुनाव बेमानी है.

जहां तक हिंदू सांप्रदायिकता की बात है, तो इस शब्द की अवधारणा ही गलत है. हिंदू धर्म का आधार ही सर्वधर्मसमभाव और सहिष्णुता है. 90 के दशक की शुरुआत में इसी तरह से हिंदू राष्ट्रवाद की बात फैलायी गयी थी. उस वक्त यह प्रचारित किया गया था कि हिंदू राष्ट्रवाद का मतलब है देश की एकता और अखंडता को कायम रखना और हिंदू राष्ट्र का निर्माण करना. हिंदू राष्ट्रवाद के ये दोनों उद्देश्य एक दूसरे के खिलाफ हैं. हिंदू राष्ट्र की कल्पना करते हुए देश की एकता और अखंडता कायम नहीं रखी जा सकती है. अगर हिंदू राष्ट्र थोपने की बात होती, तो देश में हिंसा का ऐसा दौर चलता कि देश की एकता और अखंडता खतरे में पड़ जाती. दरअसल हिंदू राष्ट्रवाद के सिद्धांत का प्रतिपादन और प्रचार करके समाज में भ्रम फैलाने की गहरी साजिश की गयी थी, जिसमें तर्को के लिए कोई जगह नहीं बची थी. पहले हिंदू राष्ट्रवादियों का भय पैदा किया गया था और बाद में उसके खिलाफ धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देकर राजनीतिक फायदा उठाया गया था. धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिकता के खिलाफ प्रचार का एक ऐसा वितान खड़ा किया गया था, जिससे जनता भयाक्रांत होकर किसी पार्टी विशेष के पक्ष में मतदान कर सके. हिंदू राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्ष सांप्रदायिकता के खिलाफ बोलनेवालों को हिंदू सांप्रदायिक करार दे दिया जा रहा था. अब एक बार फिर वैसा ही भय का माहौल पैदा कर सियासी फसल काटने की तैयारी की जा रही है.

इन दिनों धर्मनिरपेक्षता की वकालत करनेवालों को लालकृष्ण आडवाणी बहुत अच्छे लगने लगे हैं. तथाकथित धर्मनिरपेक्ष विचारकों को लगता है कि आडवाणी अपेक्षाकृत कम कट्टर हैं. यह वही जमात है, जो बाबरी विध्वंस के बाद आडवाणी को देश का सामाजिक ताना-बाना ध्वस्त करने का जिम्मेवार मान रही थी. ये वही लोग हैं, जो उस वक्त आडवाणी को कट्टर और अटल बिहारी वाजपेयी को उदार छवि के मानते थे. उनके तर्को के आधार तब भी गलत थे और अब भी गलत हैं.

दरअसल, हमारे देश में नेहरू के बाद सही मायने में धर्मनिरपेक्षता को जोरदार तरीके से बढ़ावा देनेवाला कोई नेता हुआ ही नहीं. नेहरू का मानना था कि राष्ट्रवाद की भावना को धर्म नहीं, बल्कि संस्कृति मजबूत कर सकती है. उनकी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में अशोक, अकबर, कबीर और गुरु नानक को नायक के तौर पर याद किया गया है. गांधी को भी, क्योंकि गांधी ने भी धर्म को राष्ट्र से अलग किया था. उन्होंने कहा था कि अगर हिंदू सोचते हैं कि यह सिर्फ उनका देश है, तो वे सपनों की दुनिया में हैं. भारत को जिन हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई ने अपना देश चुना है, वे सभी भाई हैं.

सामाजिक न्याय के मसीहाओं की धर्मनिरपेक्षता को देश ने नब्बे के दशक में देखा, जब धर्मनिरपेक्षता के नाम पर समाज को बांटने का खतरनाक खेल खेला गया. उसके बाद के दिनों में वर्ग, जाति, धर्म और समुदाय के नाम पर राजनीति का रंग और गाढ़ा हुआ. अब हालत यह है कि देश के दो मुख्य दलों के अध्यक्ष धर्मगुरुओं के आशीर्वाद के आकांक्षी हैं. इस महान देश में कोई तानाशाह पैदा नहीं हो सकता है. तानाशाही को देश की जनता बरदाश्त नहीं करेगी और एक क्या, हजार मोदी भी इस देश में फासीवाद नहीं थोप सकते हैं. आग्रह सिर्फ इतना है कि देश में भय की राजनीति बंद होनी चाहिए और जनता को चाहिए कि वह इन कोशिशों को नाकाम करे.

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