जनता के बीच खड़े अभिनय सम्राट

।। लोकनाथ तिवारी।। (प्रभात खबर, रांची) चुनाव की चार दिन की चांदनी खत्म होने दीजिए, फिर जनता को उसकी औकात का पता चल जायेगा. अभी वह खुद को जनार्दन माने बैठी है. और, यह गलतफहमी हो भी क्यों ना? बड़े-बड़े लोग उसे पूज जो रहे हैं. उसकी खुशामद में बिछे जा रहे हैं. कल तक […]

।। लोकनाथ तिवारी।।

(प्रभात खबर, रांची)

चुनाव की चार दिन की चांदनी खत्म होने दीजिए, फिर जनता को उसकी औकात का पता चल जायेगा. अभी वह खुद को जनार्दन माने बैठी है. और, यह गलतफहमी हो भी क्यों ना? बड़े-बड़े लोग उसे पूज जो रहे हैं. उसकी खुशामद में बिछे जा रहे हैं. कल तक जो काले शीशेवाले वातानुकूलित वाहनों से सरपट निकल लेते थे, अब वे धूल- कीचड़ भरी गलियों में ‘मैले-कुचैले’ बच्चों को भी गोद में उठाने से परहेज नहीं कर रहे. नेता मंच से खुद को सेवक और जनता को मालिक कह रहे हैं. पता नहीं कब से यह जुबान बोली जा रही है?

इसका कोई पुख्ता दस्तावेज भले ही ना हो, लेकिन हमारे काका बताते हैं कि गांधी युग से ही नेताओं ने जनता जनार्दन की जुबान अपनायी हुई है. पहले इनमें थोड़ी बहुत शर्म बची थी, चुनाव के बाद भी जनता के बीच आते-जाते रहते थे. लेकिन, अब निहायत बेशर्म और हद दरजे के शर्म-निरपेक्ष हो गये हैं. चुनाव के समय जनता के बीच जाकर स्वयं को उनका सेवक कहते हैं, जबकि अंदर ही अंदर वे खुद को उनका भाग्यविधाता मानते हैं. कमर तक झुक कर जनता को प्रणाम करने वाले यूं अभिनय करते हैं, जैसे पैदाइशी विनम्र हों.

चुनावी मौसम में इनकी चाल-ढाल, बोली और रहन-सहन सब कुछ बदल गया है. मंच पर ओवरएक्टिंग भी करते हैं. ऐसा लगता है, जैसे रामलीला कर रहे हैं. दिन-रात अभिनय करते दिखते हैं. मंदिर में जाते हैं तो पुजारियों को मात देने लगते हैं. मसजिद में मौलवियों से अधिक पाक दिखते हैं. गिरजाघरों में जाते हैं तो ऐसा लगता है, जैसे जनता के लिए सूली पर खुद ही चढ़ जायेंगे. हालांकि इनके विनय के रेशमी परदे के पीछे अहं की कुरूपता भी कभी-कभी उजागर हो जाती है. आखिर अहं की प्रकृति ही प्रदर्शन की होती है. लाख छिपाने के बावजूद हमारे नेताओं के भी असली चेहरे नुमायां हो जाते हैं. भले ही ये अपने बयानों से मुकरने की कलाबाजी जानते हों, पर इनका चेहरा पाब्लिक के सामने आ ही जाता है.

शिकारी भले ही स्वयं को जनता के सामने मेमना बना कर पेश करे, लेकिन उसके नाखून दिख ही जाते हैं. अभिनय में अमिताभ बच्चन को भी मात देनेवाले इन नेताओं की हकीकत कौन नहीं जानता? मंच पर अपने देह-भाषा के सहारे चांदी काटनेवाले ये नेता चुनाव जीतने के बाद किसी शहंशाह से कम नहीं होते. फिर जनता बेचारी उनके दर्शन के लिए तरस जाती है. जनता इस चुनावी मौसम में खुद को घोड़ी पर सवार उस दूल्हे की तरह मान रही है जिसे हर कोई महत्व देता है. ये नहीं जानती कि बारात विदा होते ही उसे आटे-दाल का भाव पता चल जानेवाला है. सेहरा उतरने के चंद दिनों बाद ही उसकी हालत धोबी के कुत्ते की होनेवाली है. काका के अनुसार, जनता का हाल शादीशुदा से भी गया-गुजरा हो जाता है. न नेता पूछने आते हैं, न सरकार.

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