‘ट्रैक द मिसिंग चाइल्ड’ के अनुसार झारखंड के 238 बच्चे लापता हैं. वेब पोर्टल नेशनल ट्रैकिंग सिस्टम फॉर मिसिंग एंड वलनरेबल चिल्ड्रेन केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्रलय की ओर से संचालित की जाती है.
इसमें सभी राज्यों से लापता बच्चों की सूचनाएं संलगA रहती हैं. लापता बच्चे आखिर जाते कहां हैं? इसका जवाब ज्यादा मुश्किल नहीं. कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के अध्ययनों से यह बात साबित हो चुकी है कि मानव तस्करी करने वाले गिरोह इस काम में बड़े पैमाने पर सक्रि य हैं. ऐसे गिरोह प्लेसमेंट एजेंसियों के नाम से शहरों में सक्रि य हैं. शहरों के गरीब इलाकों या गांव-देहात से अपहरण कर या बहला-फुसला कर लाये बच्चों को न सिर्फ बंधुआ मजदूरी या भीख मांगने के काम में लगा देते हैं, बल्कि बहुत सारे बच्चे मानव अंगों के तस्करों के जाल में फंस जाते हैं.
लड़कियों को नौकरानी का काम करने या देह व्यापार के लिए बेच दिया जाता है. बीते कुछ सालों में झारखंड का नाम यौन पर्यटन एवं बाल तस्करी जैसे संगठित अपराधियों के चरागाह के रूप में सामने आया है. झारखंड में बच्चों की बढ़ती गुमशुदगी एक समस्या बन कर रह गयी है. पुलिस महकमा पुराने लापता बच्चों का सुराग लगा पाये, इससे पहले और बच्चे गायब हो जाते हैं. सरकार की शिथिलता और पुलिस की निष्क्रि यता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि झारखंड में गायब होनेवाले बच्चों की तादाद में दिन-प्रतिदिन बढ़ोतरी होती ही जा रही है.
जो बच्चे लापता हो जाते हैं. उनमें से ज्यादातर कभी अपने घर लौट कर नहीं आते. बच्चों के रहस्यमय ढंग से लापता होने की समस्या गंभीर ही होती जा रही है. लेकिन मजाल है कि सरकार का ध्यान इस ओर हो. गुमशुदा बच्चों के प्रति सरकार का रवैया पहले भी निराशाजनक था और आज भी है. बच्चों की गुमशुदगी और बाल तस्करी को रोकने के लिए कानून, निगरानी व्यवस्था एवं विभिन्न संबंधित विभागों के बीच समन्वय एवं सहयोग जरूरी है. कुल मिला कर केंद्र व राज्य सरकार के साथ तमाम सामाजिक संगठनों की साझा कोशिशों से ही मानव तस्करी, सेक्स टूरिज्म जैसे जघन्य अपराधों पर काबू पाया जा सकता है. ऐसा होने के बाद ही बच्चों की गुमशुदगी की विकराल होती समस्या से पार पाया जा सकता है.
