नरेंद्र मोदी के पीएम उम्मीदवार घोषित होते ही भाजपा कार्यकर्ताओं में जो खुशी की लहर छा गयी थी, वह देखते ही बनती थी. संगठन की मजबूती के लिए हर एक कार्यकर्ता ने जी जान लगा कर चुनाव प्रचार में अपनी भागीदारी दिखा रहा है, इसी आस के साथ कि इस बार मोदी को प्रधानमंत्री बनाना है, लेकिन पार्टी के अंदर ही ऐसे कई शकुनी हैं, जो पार्टी की एकता को भंग करने पर तुले हुए हैं.
इस बार के चुनाव में ऐसा ही कुछ देखने को मिल रहा है. यूं तो पार्टी का वरीय पदाधिकारी वह होता है जो पार्टी को साथ लेकर चले, लेकिन जब वही पदाधिकारी पार्टी के अन्य कार्यकर्ताओं से सौतेलेपन का व्यवहार करता है, तो इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट जाता है. चुनाव के दौरान तो पार्टी के लोग जनता को उनका हक दिलवाने का आश्वासन देते हैं, पर वे तो खुद ही अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं का हक छीन लेते हैं. पार्टियों में पद के हिसाब से नहीं बल्कि पदाधिकारी के पसंद के लोगों को जिम्मेवारियां दी जाती हैं.
आम कार्यकर्ताओं का हक मार ऐसे शख्स को शीर्ष पर बिठा दिया जाता है जो सिर्फ चुनाव के दौरान ही नजर आता है. पार्टी पदाधिकारी अपने चहेते लोगों से गूफ्तगू करते हैं और अंदर ही अंदर सारी रणनीति बन जाती है. पदाधिकारी के इस रवैये से कार्यकर्ताओं में जरा सी भी खुशी नहीं दिखती. कई कार्यकर्ता तो पार्टी छोड़ने पर आमादा हैं, लेकिन नमो की जीत के लिए मन मसोस कर रह जाते हैं. इस बार के चुनाव में जो अव्यवस्था हुई है, उससे तो यही लगता है कि अगर पार्टी जीत भी गयी तो जीत का श्रेय पदाधिकारी स्वयं और अपने चहेते को ही देंगे. हम कार्यकर्ताओं को कौन पूछता है? संगठन का यही रवैया रहा, तो आने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हें मुंह की खानी पड़ेगी. दशई भगत, लोहरदगा
