लोकसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपने-अपने घोषणापत्र जारी कर दिये हैं. इनमें देशभर में 100 नये शहर बसाने, बुलेट ट्रेन चलाने की बातें हो रही हैं. गरीबों के परिवारों को मुफ्त चावल देनी की बातें हो रही हैं.
नहीं हो रही हैं ग्राम विकास की बातें. जिस देश में 70} लोग गांवों में रहते हैं, उनके विकास की कोई कार्ययोजना किसी राजनीतिक दल के एजेंडे में नहीं है. दिल्ली में सत्ता का पिरामिड खड़ा हो गया है. दिल्ली के एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर लोग शहर केंद्रित योजनाएं बना रहे हैं.
कहते हैं, भारत की आत्मा उसके गांवों में बसती है, फिर आत्मा को कलपने-रोने को क्यों छोड़ दिया गया है? काश कोई ऐसा राजनीतिक दल आगे आये, जो दिल्ली में खड़े सत्ता के पिरामिड को उलट कर भारत की आत्मा गांवों को विकास की ओर उन्मुख कर गांधी जी के सपनों को पूरा कर सके.
कौशलेंद्र नारायण, ई-मेल से
