लोकसभा चुनाव के पहले और दूसरे चरण में पूर्वोत्तर के राज्यों में भारी मतदान, इस चुनाव की शुभ शुरुआत मानी जा सकती है. पहले चरण में त्रिपुरा की दो सीटों में से एक पर हुए मतदान में 86 फीसदी लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया, वहीं असम में यह आंकड़ा 75 फीसदी से अधिक रहा. बुधवार को दूसरे चरण में भी अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड और मणिपुर में मतदाताओं की जबर्दस्त भागीदारी की खबर है.
देश की मुख्यधारा में पूवरेत्तर के मुद्दे आमतौर पर हशिये पर रहते हैं और संसद में संख्या के खेल में भी वे जरूरी नहीं समङो जाते. मीडिया में शायद ही कभी उनकी कोई सकारात्मक खबर आती है. ऐसे में देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनका यह भरोसा समूचे देश के लिए प्रेरणा का स्नेत होना चहिए. तीसरे चरण में आज बिहार व झारखंड में भी मतदान हो रहा है.
2009 के आम चुनाव में इन दो राज्यों में मतदान का प्रतिशत क्रमश: 44.27 और 49.77 फीसदी ही रहा था, जो कि इस चुनाव में हुए मतदान के राष्ट्रीय औसत (56.97 प्रतिशत) से बहुत कम था. इन आंकड़ों से साफ है कि बिहार-झारखंड के मतदाताओं का बड़ा हिस्सा चुनावी प्रक्रिया के प्रति उदासीन है. यह राजनीतिक दलों, सरकारों, संस्थाओं और मीडिया की सामूहिक असफलता का सूचक तो है ही, मतदाताओं में जागरूकता की कमी को भी दर्शाता है. इसके कारणों पर गंभीर बहस की दरकार है. फिलहाल हमें बाबासाहेब आंबेडकर के एक कथन पर गंभीरता से विचार करना चहिए. उन्होंने कहा था, ‘उदासीनता लोगों को ग्रसित करनेवाली सबसे बुरी बीमारी है.’ बिहार और झारखंड लोकसभा में कुल 54 प्रतिनिधि भेजते हैं, जो सदन की कुल संख्या का दस फीसदी है.
पिछले आम चुनाव में देश भर से 29 ऐसे सांसद चुने गये थे, जिन्हें कुल मतदान के तीस फीसदी से कम वोट मिले थे. इन सांसदों में कई बिहार-झारखंड से भी निर्वाचित हुए थे. यह मतदाता की संवैधानिक जिम्मेवारी है कि वह सबसे बेहतर जनप्रतिनिधि संसद में भेजे, जो निष्ठा और ईमानदारी से जनहित में काम करे. यदि बहुत से मतदाता मतदान ही नहीं करेंगे, तो फिर संसद व सरकार से देश और जनता की भलाई की उम्मीद बेमानी होगी और देश को गढ़ने का सपना महज सपना ही रह जायेगा.
