संविधान निर्माताओं ने राजनीति को सेवा का माध्यम मान कर ही प्रावधान बनाये थे. वर्तमान समय में वह परिकल्पना धूल-धूसरित हो गयी है. सुख-सुविधा, सत्ता और बेशुमार धन कमाने का माध्यम बन गयी है राजनीति. चुनावों में केवल धनबली अथवा बाहुबली के अलावा जातियों के क्षत्रपों का ही बोलबाला नजर आ रहा है. चुनाव आयोग ने भी लोकसभा चुनाव में खर्च की राशि 70 लाख करके यह संदेश दिया की नि:स्वार्थ राजनीति के दिन लद गये.
अब जो यह राशि निवेश करेगा, उसमें जीतने के बाद कई गुना पैसे बनाने की ख्वाहिश होना लाजिमी ही है. साथ में बोनस के तौर पर ताकत और प्रतिष्ठा की चाह अलग से होगी. ईमानदार राजनीति करने के लिए चुनाव में उतरनेवाले लोग इन पैसों की चकाचौंध में खो जाते हैं. इसके सबसे बड़े दोषी हम सब हैं, क्योंकि हम सब कुछ पैसों से तौलते हैं.
डी कृष्णमोहन, राजधनवार
