।। डॉ अमित रंजन।।
(विदेश मामलों के जानकार)
मौजूदा चुनाव में बांग्लादेश की चरचा तो की जा रही है, लेकिन वह सिर्फ क्षेत्रीय स्तर पर शरणार्थियों और स्थानीय लोगों के बीच तनाव का राजनीतिक लाभ उठाने तक ही सीमित है. ऐसी स्थिति में भारत-बांग्लादेश संबंधों पर एक संतुलित समझ की जरूरत है. 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद भारत को उम्मीद थी कि बांग्लादेश भारत के प्रभाव में रहेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. शेख मुजीब-उर-रहमान के कार्यकाल (1972-1975) में दोनों देशों के बीच संबंध अच्छे बने रहे. पर, 1975 में उनकी हत्या के बाद भारत-बांग्लादेश के संबंधों में बदलाव आ गया. पहली चुनौती तब सामने आयी, जब बांग्लादेश ने संयुक्त राष्ट्र में गंगा नदी के जल की साङोदारी के सवाल को उठाया. संयुक्त राष्ट्र के निर्देश पर 1977 में भारत को बांग्लादेश के साथ जल समझौते पर हस्ताक्षर करना पड़ा.
बांग्लादेश में सैनिक शासन के दौरान दोनों देशों के बीच कटुता व अविश्वास और भी बढ.गया. लोकतंत्र बहाली के बाद शेख हसीना (1996-2001) के सत्ता में आने के बाद संबंधों में एक बार फिर से सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई. उनके विभिन्न कार्यकालों में भारत और बांग्लादेश के बीच कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, जिनमें 1996 का जल समझौता और 2011 का सीमा समझौता काफी अहम हैं.
इस चुनाव में बांग्लादेश से जुड़े कुछ अहम मुद्दों को रेखांकित करना आवश्यक है. 1971 की बांग्लादेश में स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान काफी संख्या में बांग्लादेशी भारत आ गये थे, उनमें से कुछ युद्ध खत्म होने के बाद भी वापस नहीं लौटे. बंगाल, मेघालय, असम, मिजोरम, त्रिपुरा और मणिपुर में कई स्थानों पर ये शरणार्थी बसे हुए हैं. यद्यपि हिंदू शरणार्थियों को बसाने में भारत ने मदद की, लेकिन मुसलमानों के साथ विदेशियों की तरह बर्ताव किया गया. शरणार्थियों की बढ़ती संख्या की जांच के लिए इंदिरा गांधी सरकार द्वारा 1983 में अवैध शरणार्थी कानून पारित किया गया.
आरोप लगाया जाता है कि शरणार्थियों को मतदाता के रूप में पंजीकृत करने और चुनावों में उनका वोट पाने के लिए इस कानून को लागू किया गया था. शरणार्थियों की मौजूदगी का लगातार विरोध भी होता रहा है. असम में असम गण परिषद् (अगप) का उदय ही शरणार्थियों से राज्य को मुक्ति दिलाने के वायदे के आधार पर हुआ. भाजपा ने भी अगप के इस राजनीतिक मिशन को अपना पूर्ण समर्थन दिया. नतीजतन, अवैध शरणार्थी कानून के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू हो गयी और 2005 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून के खिलाफ फैसला दे दिया. यह राजनीतिक संघर्ष पिछले कई वर्षो से राजनीतिक दलों के पैंतरों के कारण हिंसक रूप ले चुका है, जिसकी भयावह परिणति बोडो-मुसलिम हिंसा में दिखती है. तनाव का एक अन्य कारण रोजगार के लिए परमिट पर आये बांग्लादेशी और भारतीय कामगारों के बीच खींचतान भी है. सीमावर्ती राज्यों में अनेक क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों द्वारा इन मुद्दों को उठाया जाता रहा है.
बांग्लादेश में अतिवादी समूहों के उभार को भारत की दक्षिणपंथी पार्टियों ने राजनीतिक लाभ के लिए भुनाने की कोशिश की है. शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना द्वारा मुंबई में बांग्लादेशी शरणार्थियों पर हमले की घटनाएं भी हुई हैं. उनका आरोप है कि ये शरणार्थी कथित रूप से अपराध और भारतविरोधी गतिविधियों में शामिल हैं. हमले के पीछे उनका उद्देश्य बांग्लादेशी शरणार्थियों को मुंबई में काम करने से हतोत्साहित करना है, ताकि मराठियों के बीच इनकी साख मजबूत हो.
भारत का बांग्लादेश के साथ भूमि, नदी और तटवर्तीय सीमा के विवाद हैं. इंदिरा गांधी और शेख मुजीब के बीच 16 मई, 1974 को हुए समझौते के तहत तीन बीघा गलियारा और दक्षिणी बेरूबारी की संप्रभुता को बनाये रखने के लिए दोनों देशों में सहमति बनी थी. 1974 में बांग्लादेश ने दक्षिणी बेरूबारी का आधिपत्य भारत को सौंप दिया था, लेकिन भारत ने अदला-बदली नहीं की. लंबे समय के बाद, सितंबर, 2011 में तीन बीघा गलियारे को बांग्लादेश को सौंपने के बजाय भारत ने इसे लीज पर दे दिया. समझौते में दोनों देशों में अंत: क्षेत्रों की अदला-बदली की बात कही गयी थी, जिसमें बांग्लादेश में 111 और भारत में 51 क्षेत्र शामिल थे. यद्यपि इस समझौते पर 2011 में हस्ताक्षर हुआ था, लेकिन भारतीय संसद की मंजूरी नहीं मिलने के कारण यह समझौता उपेक्षित हो गया. राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां सीमा-विवाद के मुद्दे को कई बार उठा चुकी हैं. वे भौगोलिक सीमा की तुलना भारत की संप्रभुता के साथ करती हैं. यह मुद्दे राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा उठाये जाते हैं और बांग्लादेश के साथ लगी भारतीय सीमा के क्षेत्रों में मतदान पर प्रभाव भी डालते हैं, लेकिन सवाल यह है कि हमारी पार्टियों को इनके समाधान में कोई दिलचस्पी है या नहीं?
