पहले केवल उपभोक्ता वस्तुओं का विज्ञापन होता था, जैसे तेल, साबुन, शैंपू, दंतमंजन इत्यादि. समय के साथ विज्ञापनों का दायरा बढ़ता गया और इसके अंतर्गत आनेवाली चीजों की अंतहीन सूची में अब लोकतांत्रिक चुनावों में उपनी उम्मीदवारी पेश करनेवाले लोग भी शामिल हो गये हैं. यूं तो लोकतंत्र में चुनाव बिना प्रचार के संपन्न नहीं हो सकता, क्योंकि जब तक प्रत्याशी जनता के समक्ष उपस्थित नहीं होगा, अपने कार्यो और भावी योजनाओं के बारे में नहीं बतायेगा, वादे, घोषणाएं नहीं करेगा, तब तक जनता मत देने का फैसला कैसे लेगी!
प्रचार अपना हो और दूसरे के अधिकारों का उल्लंघन न हो, किसी के बारे में गलत बातें प्रचारित न हों, किसी की भावनाओं को ठेस न पहुंचे, इसके लिए चुनाव आयोग दिशा-निर्देश जारी करता है. लेकिन इस वक्त जो चुनावी माहौल बना है, उसमें संयमति भाषा और मुद्रा दोनों का ही अभाव नजर आ रहा है. कांग्रेस अपना प्रचार कर रही है, लेकिन भाजपा के विरोध के साथ. भाजपा में नरेंद्र मोदी का प्रचार हो रहा है, लेकिन राहुल व सोनिया गांधी का विरोध अधिक दिख रहा है. पूरा प्रचार व्यक्तिपरक है. आम आदमी पार्टी में कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही विरोध से प्रचार हो रहा है. भाजपा के विज्ञापन इसी तर्ज पर आ रहे हैं. ऐसे ही एक विज्ञापन में अंपायर टॉस करने की प्रतीक्षा कर रहा है, एक टीम का कप्तान आ गया है, जबकि दूसरा नदारद है. जिस टीम का कप्तान ही नहीं, उसका हारना तय है, यही इस विज्ञापन का मर्म है. लेकिन इसमें उस संसदीय व्यवस्था का मजाक बन रहा है, जिसमें निर्वाचित सांसदों को अपना नेता चुनने का अधिकार प्राप्त है. इन विज्ञापनों से बरबस हंसी छूटती है, लेकिन है यह लोकतंत्र विरोधी मानसिकता से ग्रसित!
अनिल सक्सेना, जमशेदपुर
