जाति-धर्म के नाम पर वोट कब तक?

कुछ ही दिनों में लोकसभा चुनाव के लिए मतदान होनेवाला है. सभी पार्टियां अपने-अपने प्रचार में लगी हैं. टीवी चैनलों पर इस चुनाव को लेकर रोज गोष्ठियां हो रहीं हैं. अखबार के लगभग सभी पृष्ठ चुनावी रंग से रंगे मिलते हैं या यूं कहें कि पूरा देश चुनावमय हो गया है. मीडियावाले जनता से पूछ […]

कुछ ही दिनों में लोकसभा चुनाव के लिए मतदान होनेवाला है. सभी पार्टियां अपने-अपने प्रचार में लगी हैं. टीवी चैनलों पर इस चुनाव को लेकर रोज गोष्ठियां हो रहीं हैं. अखबार के लगभग सभी पृष्ठ चुनावी रंग से रंगे मिलते हैं या यूं कहें कि पूरा देश चुनावमय हो गया है.

मीडियावाले जनता से पूछ रहे हैं कि जनता इस चुनाव में अपने लिए कैसा नेता चुनना चाहेगी. जवाब में जनता कह रही है कि वे ईमानदार, साफ-सुथरी छवि वाला नेता ही अपने लिए चुनेगी. फिर सवाल यह उठता है कि जब सभी साफ-सुथरी छवि वाला नेता ही चाहते हैं, तो दागी नेता आते कहां से हैं.

या फिर सुनने-बोलने में जो बातें अच्छी लगती हैं वैसी ही बातें हम करते हैं और ऐन समय पर हम जाति के आधार पर, धर्म के आधार पर, गांव-देहात के आधार पर अपना कीमती वोट डाल आते हैं. ऐसा क्यों और कब तक?

गीता दुबे, जमशेदपुर

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