वन महोत्सव की शुरुआत हो चुकी है. हम पुन: एक बार लाखों पेड़ लगायेंगे. नि:संदेह यह बहुत ही अच्छा प्रयास है, लेकिन क्या हम पहले से लगे हुए वनों के प्रति सजग और संवेदनशील हैं. शायद नहीं.
पेड़ों पर प्रचार-प्रसार के लिए लगाये गये सरकारी/ गैर सरकारी पोस्टर, जिसमें कीलों से पोस्टरों को पेड़ों पर ठोका जाता है तथा कुछ में छालों को हटाकर लिखा जाता है, हमारी संवेदनहीनता को बताता है. यह जानते हुए भी कि वृक्षों को भी हमारे जैसे दर्द का अनुभव होता है, हमने उनपर जुल्म ढ़ाये हैं. विड़ंबना तो यह है कि सरकारी काम भी पेड़ों पर इस प्रकार किये जा रहे हैं. सरकारी तंत्र को चाहिए कि इस प्रकार के कार्यों पर रोक लगाते हुए, वन महोत्सव के साथ वन स्वतंत्रता महोत्सव भी मनाये.
विवेक सुरीन, इमेल से
